गुरुवार, 9 जून 2016

ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर।

        ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर ।

ग़ुरूर ऐ गर्व है नफ़रत ,कभी तो सर झुकाया कर ।
सभी इज्जत करे तेरी यही दौलत कमाया कर ।।

ये माना शाने शौक़त की तुम्हे परवाह है काफ़ी ।
मग़र रिस्तों की बेमानी रश्मे भी निभाया कर ।।

करेगा क्या जबाने भर की दौलत तू कमा करके ।
खुदा की बन्दगी में पल दो पल ही गवांया कर ।।

अदब से पेश तुम आओ बनो मरहम मरीजे गम ।
दिलों में प्यार की लौ से यहा रंजिश मिटाया कर ।।

मिलेगी मौत है मुमकिन गुनाहों से करो तौबा ।
खुदी की जिंदगी की भी कभी क़ीमत चुकाया कर ।।

भरे है लाख़ रंजोग़म यहा दुनियां में खुद हमदम ।
लगा कर आग़ नफ़रत की दिलों को मत जलाया कर ।।

मिलेंगी एक दिन तुमको यक़ीनन में खुसी 'रकमिश' ।
किसी की आँख में हसरत ,खुशियां तू बसाया कर ।।

                              राम केश मिश्र 'रकमिश'

ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर।

        ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर ।

ग़ुरूर ऐ गर्व है नफ़रत ,कभी तो सर झुकाया कर ।
सभी इज्जत करे तेरी यही दौलत कमाया कर ।।

ये माना शाने शौक़त की तुम्हे परवाह है काफ़ी ।
मग़र रिस्तों की बेमानी रश्मे भी निभाया कर ।।

करेगा क्या जबाने भर की दौलत तू कमा करके ।
खुदा की बन्दगी में पल दो पल ही गवांया कर ।।

अदब से पेश तुम आओ बनो मरहम मरीजे गम ।
दिलों में प्यार की लौ से यहा रंजिश मिटाया कर ।।

मिलेगी मौत है मुमकिन गुनाहों से करो तौबा ।
खुदी की जिंदगी की भी कभी क़ीमत चुकाया कर ।।

भरे है लाख़ रंजोग़म यहा दुनियां में खुद हमदम ।
लगा कर आग़ नफ़रत की दिलों को मत जलाया कर ।।

मिलेंगी एक दिन तुमको यक़ीनन में खुसी 'रकमिश' ।
किसी की आँख में हसरत ,खुशियां तू बसाया कर ।।

                              राम केश मिश्र 'रकमिश'

ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर।

        ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर ।

ग़ुरूर ऐ गर्व है नफ़रत ,कभी तो सर झुकाया कर ।
सभी इज्जत करे तेरी यही दौलत कमाया कर ।।

ये माना शाने शौक़त की तुम्हे परवाह है काफ़ी ।
मग़र रिस्तों की बेमानी रश्मे भी निभाया कर ।।

करेगा क्या जबाने भर की दौलत तू कमा करके ।
खुदा की बन्दगी में पल दो पल ही गवांया कर ।।

अदब से पेश तुम आओ बनो मरहम मरीजे गम ।
दिलों में प्यार की लौ से यहा रंजिश मिटाया कर ।।

मिलेगी मौत है मुमकिन गुनाहों से करो तौबा ।
खुदी की जिंदगी की भी कभी क़ीमत चुकाया कर ।।

भरे है लाख़ रंजोग़म यहा दुनियां में खुद हमदम ।
लगा कर आग़ नफ़रत की दिलों को मत जलाया कर ।।

मिलेंगी एक दिन तुमको यक़ीनन में खुसी 'रकमिश' ।
किसी की आँख में हसरत ,खुशियां तू बसाया कर ।।

                              राम केश मिश्र 'रकमिश'

ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर।

        ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर ।

ग़ुरूर ऐ गर्व है नफ़रत ,कभी तो सर झुकाया कर ।
सभी इज्जत करे तेरी यही दौलत कमाया कर ।।

ये माना शाने शौक़त की तुम्हे परवाह है काफ़ी ।
मग़र रिस्तों की बेमानी रश्मे भी निभाया कर ।।

करेगा क्या जबाने भर की दौलत तू कमा करके ।
खुदा की बन्दगी में पल दो पल ही गवांया कर ।।

अदब से पेश तुम आओ बनो मरहम मरीजे गम ।
दिलों में प्यार की लौ से यहा रंजिश मिटाया कर ।।

मिलेगी मौत है मुमकिन गुनाहों से करो तौबा ।
खुदी की जिंदगी की भी कभी क़ीमत चुकाया कर ।।

भरे है लाख़ रंजोग़म यहा दुनियां में खुद हमदम ।
लगा कर आग़ नफ़रत की दिलों को मत जलाया कर ।।

मिलेंगी एक दिन तुमको यक़ीनन में खुसी 'रकमिश' ।
किसी की आँख में हसरत ,खुशियां तू बसाया कर ।।

                              राम केश मिश्र 'रकमिश'

ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर।

        ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर ।

ग़ुरूर ऐ गर्व है नफ़रत ,कभी तो सर झुकाया कर ।
सभी इज्जत करे तेरी यही दौलत कमाया कर ।।

ये माना शाने शौक़त की तुम्हे परवाह है काफ़ी ।
मग़र रिस्तों की बेमानी रश्मे भी निभाया कर ।।

करेगा क्या जबाने भर की दौलत तू कमा करके ।
खुदा की बन्दगी में पल दो पल ही गवांया कर ।।

अदब से पेश तुम आओ बनो मरहम मरीजे गम ।
दिलों में प्यार की लौ से यहा रंजिश मिटाया कर ।।

मिलेगी मौत है मुमकिन गुनाहों से करो तौबा ।
खुदी की जिंदगी की भी कभी क़ीमत चुकाया कर ।।

भरे है लाख़ रंजोग़म यहा दुनियां में खुद हमदम ।
लगा कर आग़ नफ़रत की दिलों को मत जलाया कर ।।

मिलेंगी एक दिन तुमको यक़ीनन में खुसी 'रकमिश' ।
किसी की आँख में हसरत ,खुशियां तू बसाया कर ।।

                              राम केश मिश्र 'रकमिश'

रविवार, 5 जून 2016

ग़ज़ल।आशियाना मिल गया।

         ग़ज़ल।आशियाना मिल गया ।

आदमी को खुदा, खुद का ठिकाना मिल गया ।
फ़र्ज ,शिक़वे रह गये साहिल पुराना मिल गया । 

बेदख़ल होने लगा है अब वजूदे हुस्न से वह ।
सरज़मी के पार जाने का बहाना मिल गया ।।

आ रही थी बनके छाया रात हर दीदार करने ।
वक्त की बंदिश हटी मौका सुहाना मिल गया ।।

एकतरफ़ा प्यार से क़ायल रही जो उम्र भर ।
उम्र रूठी ,मौत को बेशक दीवाना मिल गया ।

दौलतों की शाने शौक़त हो गयी ख़ामोश देखो ।
लुट गया, खुद लूटकर सारा खज़ाना मिल गया ।।

आज तू ख़ामोश रोयेगा जबाना फ़र्क़ किसको ।
क़हक़हे दो चार दिन मातम मनाना मिल गया ।।

सो गये "रकमिश"न जाने लोग कितने शौक़ से । ।
जिंदगी को मौत का इक आशियाना मिल गया । 

                       रामकेश मिश्र"रकमिश"

गुरुवार, 2 जून 2016

ग़ज़ल।मुझको शिफ़ारिश न मिली।

        ग़ज़ल।मुझको। सिफ़ारिश न मिली ।

आज तक मेरे प्यार को बेसक गुज़ारिश न मिली ।
फ़ासला था नाम का फिर भी सिफ़ारिश न मिली । 

आये इलाजे इश्क़ की बनकर दवा इस जिंदगी में ।
चार दिन रौनक रही फ़िर कोई नुमाइश न मिली ।

एकटक नज़रों के बदले दे गये तनहाइयां फ़िर ।
दर्द का हिस्सा मिला यांदें निख़ालिश न मिली ।। 

बेवज़ह आँखों का मेरे जुल्म साबित हो चुका था ।
फ़ैसला उनको मिला मुझको सिफ़ारिश न मिली ।

एक दिल था ,एक उनके थी अदाओं की काशिस ।
एक तरफ़ा प्यार में कुछ आजमाइस न मिली । 

रौंदकर मेरी चाहतों को खो गये हमआम बनकर ।
मंजिलें लाखों मिली पर एक ख़्वाहिश न मिली ।।

आज भी गर्दिश है'रकमिश' तू नही तो कुछ नही  ।
प्यार में ढूढ़ा बहुत पर चाहत लवारिश न मिली ।।

                             ©राम केश मिश्र'रकमिश'

गुरुवार, 26 मई 2016

गज़ल।बेवफ़ा इंसान अब होने लगा है ।

    गीतिका।बेवफ़ा इंसान अब होने लगा है ।

आदमी हर बात को ढोने लगा है ।
झूठ सच का फासला खोने लगा है ।।

प्यार के लायक नही जो प्यार में ।
दोस्ती से हाथ भी धोने लगा है ।।

फ़र्ज़ की सब बंदिशें खुद तोड़कर ।
बेवफ़ा इंसान अब होने लगा है ।।

क़द्र रिस्तो की न जिसने की कभी ।
है अकेला, आज वो रोने लगा है ।।

प्यार का दीपक जलाना भूलकर ।
नफ़रतों का जहर बोने लगा है ।।

वक्त से लड़ना है असली ज़िंदगी ।
जाग"रकमिश"तू कहाँ सोने लगा है ।

                           राम केश मिश्र(रकमिश)

बुधवार, 18 मई 2016

ग़ज़ल।मुहब्बत की दवा होकर।

         ग़ज़ल।मुहब्बत की दवा होकर।

बनी गम की निसानी जब तमन्ना वो वयाँ होकर ।
मिटा दी जिंदगी बेशक़ मुहब्बत मे रवाँ होकर ।

मिला मासूम जो चेहरा निगाहों की शरारत से ।
खिली हसरत बेक़ाबू बन अदाओ में जवां होकर ।

हवाओं में ,फिज़ाओ में ,निग़ाहों में ,अदाओं में ।
वो आती सामने मेरे मुहब्बत की दवा होकर ।

उठी ग़र्दिश में ज़ो रौनक सजाने के लिये दिल को ।
जलाने वो लगी मुझको ज़ख्मो पर लवा होकर । 

उठे जब क़हक़हे नफ़रत नज़ाक़त में नसीहत बन । 
पुरानी दर्द तन्हाई उभरती तब हया होकर ।

कि "रकमिश'आज तक तूने जलाया सिर्फ़ दिल मेरा ।
कभी तो हमनवां होकर कभी दर्द-ऐ-हवा होकर ।

                                ©राम केश मिश्र

शुक्रवार, 13 मई 2016

ग़ज़ल।जमानत तो मिलेगी ही ।

      ग़ज़ल।ज़मानत तो मिलेगी ही ।

रहोगे नेक दिल बेशक़ इमानत तो मिलेगी ही ।
करारा जख़्म होगा पर अमानत तो मिलेगी ही ।

ग़मे ग़र्दिश हकीक़त मे ख़ता तारीफ़ की ख़्वाहिश ।
वफ़ा की रहनुमाई में ज़लालत तो मिलेगी ही ।

बड़ी नायाब होती है अदाओं की गिरफ़्तारी ।
निग़ाहें बर्क़ रखो तुम शरारत तो मिलेगी ही ।

बहुत हो दूर मंजिल पर चले बेबाक़ तुम जाओ ।
लगेंगे ग़म भरे झोंके हरारत तो मिलेगी ही ।

शिकारी हो रहा देखो यहा हर शख़्स रंजिस में ।
साज़िश हो रही उसकी वकालत तो मिलेगी ही ।

अग़र है आदमी सच्चा अदालत क्या गवाही क्या ।
भले हो क़ैद दो इक दिन ज़मानत तो मिलेगी ही ।

अभी रमज़ान है "रकमिश" निगाहें रख रहीं रोज़ा ।
रहम लाएगा खुद मौला इनायत तो मिलेगी ही ।

                            राम केश मिश्र(रकमिश)

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...