ग़ज़ल.....
आज ले चलते है उन वादियों में , जहा पर बेफ़िक्र निग़ाहों की चहलक़दमी होती है । जहा बन्दगी नही तश्नगी होती है । वो चेहरा जो दीवानगी की ज़न्नत होता है । जो दिल को रौनक करता है । उसी की चाह में बेपरवाह ये दीवाने और उनके तड़पते ख्यायलात उफ़ !!! वो बेकसी । हर तऱफ चाहतें ही चाहते । महफ़िल ही महफ़िल । हर चेहरे पर वफ़ा-ऐ-इश्क़ की झकल में मसगूल मुस्कान ठहरती शाम की वो आबोहवा । उधर अदाओं की नुमाइस तो इधर शराफ़त की पेशकस । उधर मासूमियत का ज़ाम ऐ नज़ाकत तो इधर वफ़ा का हुजूम । फ़िर सुरू होता है दौर ऐ आज़माइस ।
जी !! मेरे अजीज़ हमसफ़र दोस्तों । तब होता है हिसाब दीवानों की हरक़त का । यक़ीनन इश्क़ बेपरवाह है । बेदाग़ है । मग़र यही मुहब्बत का फ़ितूर है ।दस्तूर है इल्म का । दर व दर ,हमदिल संगदिल की क़ीमत लगती है । हर साँस हर धङकन की क़ीमत लगती है । दिल और सिर्फ़ दिल ही फ़ैसला करता है । और रूह तक काँप जाती है अपने ही दिल की बेबसी पर जब वह किसी ग़ैर की नज़रों और ईशारों की गिरफ़्त में होते है । मेरे दोस्तों ज़ब तड़पता है दिल, कसमसाती है रात ।तब निकलती है इक आह ।तब बनती है एक ग़ज़ल ।।
ज़बाने भर से कहता हूँ कोई गद्दार न निकला ।।
मुहब्बत से करे तौबा कोई क़िरदार न निकला ।
बाक़ी फ़िर.........