बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

ग़ज़ल।दीवाने लोग आते थे।

     ग़ज़ल ।दिवाने लोग आते थे ।

जवां साहिल हुआ तन्हा बिताने लोग आते थे ।
ग़मो से ठोकरें पाकर दिवाने लोग आते थे । 

भले हो दर्द की नौबत मग़र मगरूर थे काफ़ी ।
किये जो इश्क़ में वादे निभाने लोग आते थे ।

दवा-ऐ-दर्द के ख़ातिर मुसाफ़िर वक्त के मारे ।
मिले हर एक ज़ख्मों को दिखाने लोग आते थे ।

खफाई, खौफ ,तन्हाई, जुदाई ,बेकसी लेकर ।
होने रूबरू दिल के बहाने लोग आते थे ।।

इशारे हुश्न भर साकी छलक जाते थे पैमाने ।
छोड़ दुनियां के रंजोगम मयख़ाने लोग आते थे ।

मग़र हालात के चलते वीराना हो गया साहिल ।
लुटी है प्यार की दुनिया ,लुटाने लोग आते थे ।।

दरिया भर गया "रकमिश" बहे जो प्यार में आँसू ।
छुपाकर अश्क़ की लहरें नहाने लोग आते थे ।।
                             
                     ©रकमिश सुल्तानपुरी

सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

ग़ज़ल साहिल ।तालाश ये साहिल

ग़ज़ल साहिल ।तलाश ऐ साहिल ।

  आप ग़ज़ल कैसे लिखते हो ? यही लब्ज़ होते है ;मेरे हमसफ़र हमदिलों के । माफ़ी मांगने का हक़ भी मुझे नही है । मुख़ातिब हो नही पाता । मग़र उन्हें इल्तिला कर दू क़ि दीवाना बनना ही पड़ेगा । ये इश्क़ है । दीवानगी है । जन्नते-सुरूर है । ये खुद ख़ुदा का ख़ुमार है । जो बेकसी है , प्यार है । और इस प्यार का आग़ाजनाज़ुक उम्र से निगाहों की तपन से मज़बूर । ख्वाहिशों के सफ़र में ऱप्ता ऱप्ता साहिलों पर फ़िसलते क़दम । रिस्तों की सुरुआत । वो अज़नबी और फ़िर चाहतों का अनजाना सैलाब । वो मदहोश चितवन । 

रात में बनती तस्वीरें । और तसवीरों पर सजी मुस्कान । वो बेख़ौफ़ इशारे । अकेलेपन की बेवसी । तब जाकर सुरु होती है दास्ताँ ऐ मुहब्बत । खिलते फूल और गुनगुनाती शाम । शाम ही नही ,अंधेरों के झरोखें उकेरते है वो चेहरा जिसकी चाहत है । यहा से सुरु होती है तालाश ऐ जिंदगी । यही से भटकती है राहे । यही से मिलती है जन्नते-झलक । इस नये एहशास का वज़्न दिल को तसल्ली देता है । अग़र मुलाकातों का सिलसिला जाऱी रहा तो शख़्स दर शख़्स आजमाइसो के दौर का भी आगाज़ यही से होता है । और तब निकलती है एक आह एक तड़पन । और तब बनती है ग़ज़ल ।।
           
समन्दर डूब सब निकले बैठे हम किनारे थे ।
बुझी न प्यास ऐ साकी इशारे ही इशारे थे ।।

  शेष फिर........
               .... रकमिश सुल्तानपुरी

ग़ज़ल साहिल ।तालाश ये साहिल

ग़ज़ल साहिल ।तलाश ऐ साहिल ।

  आप ग़ज़ल कैसे लिखते हो ? यही लब्ज़ होते है ;मेरे हमसफ़र हमदिलों के । माफ़ी मांगने का हक़ भी मुझे नही है । मुख़ातिब हो नही पाता । मग़र उन्हें इल्तिला कर दू क़ि दीवाना बनना ही पड़ेगा । ये इश्क़ है । दीवानगी है । जन्नते-सुरूर है । ये खुद ख़ुदा का ख़ुमार है । जो बेकसी है , प्यार है । और इस प्यार का आग़ाजनाज़ुक उम्र से निगाहों की तपन से मज़बूर । ख्वाहिशों के सफ़र में ऱप्ता ऱप्ता साहिलों पर फ़िसलते क़दम । रिस्तों की सुरुआत । वो अज़नबी और फ़िर चाहतों का अनजाना सैलाब । वो मदहोश चितवन । 

रात में बनती तस्वीरें । और तसवीरों पर सजी मुस्कान । वो बेख़ौफ़ इशारे । अकेलेपन की बेवसी । तब जाकर सुरु होती है दास्ताँ ऐ मुहब्बत । खिलते फूल और गुनगुनाती शाम । शाम ही नही ,अंधेरों के झरोखें उकेरते है वो चेहरा जिसकी चाहत है । यहा से सुरु होती है तालाश ऐ जिंदगी । यही से भटकती है राहे । यही से मिलती है जन्नते-झलक । इस नये एहशास का वज़्न दिल को तसल्ली देता है । अग़र मुलाकातों का सिलसिला जाऱी रहा तो शख़्स दर शख़्स आजमाइसो के दौर का भी आगाज़ यही से होता है । और तब निकलती है एक आह एक तड़पन । और तब बनती है ग़ज़ल ।।
           
समन्दर डूब सब निकले बैठे हम किनारे थे ।
बुझी न प्यास ऐ साकी इशारे ही इशारे थे ।।

  शेष फिर........
               .... रकमिश सुल्तानपुरी

ग़ज़ल साहिल ।तालाश ये साहिल

ग़ज़ल साहिल ।तलाश ऐ साहिल ।

  आप ग़ज़ल कैसे लिखते हो ? यही लब्ज़ होते है ;मेरे हमसफ़र हमदिलों के । माफ़ी मांगने का हक़ भी मुझे नही है । मुख़ातिब हो नही पाता । मग़र उन्हें इल्तिला कर दू क़ि दीवाना बनना ही पड़ेगा । ये इश्क़ है । दीवानगी है । जन्नते-सुरूर है । ये खुद ख़ुदा का ख़ुमार है । जो बेकसी है , प्यार है । और इस प्यार का आग़ाजनाज़ुक उम्र से निगाहों की तपन से मज़बूर । ख्वाहिशों के सफ़र में ऱप्ता ऱप्ता साहिलों पर फ़िसलते क़दम । रिस्तों की सुरुआत । वो अज़नबी और फ़िर चाहतों का अनजाना सैलाब । वो मदहोश चितवन । 

रात में बनती तस्वीरें । और तसवीरों पर सजी मुस्कान । वो बेख़ौफ़ इशारे । अकेलेपन की बेवसी । तब जाकर सुरु होती है दास्ताँ ऐ मुहब्बत । खिलते फूल और गुनगुनाती शाम । शाम ही नही ,अंधेरों के झरोखें उकेरते है वो चेहरा जिसकी चाहत है । यहा से सुरु होती है तालाश ऐ जिंदगी । यही से भटकती है राहे । यही से मिलती है जन्नते-झलक । इस नये एहशास का वज़्न दिल को तसल्ली देता है । अग़र मुलाकातों का सिलसिला जाऱी रहा तो शख़्स दर शख़्स आजमाइसो के दौर का भी आगाज़ यही से होता है । और तब निकलती है एक आह एक तड़पन । और तब बनती है ग़ज़ल ।।
           
समन्दर डूब सब निकले बैठे हम किनारे थे ।
बुझी न प्यास ऐ साकी इशारे ही इशारे थे ।।

  शेष फिर........
               .... रकमिश सुल्तानपुरी

ग़ज़ल साहिल ।तालाश ये साहिल

ग़ज़ल साहिल ।तलाश ऐ साहिल ।

  आप ग़ज़ल कैसे लिखते हो ? यही लब्ज़ होते है ;मेरे हमसफ़र हमदिलों के । माफ़ी मांगने का हक़ भी मुझे नही है । मुख़ातिब हो नही पाता । मग़र उन्हें इल्तिला कर दू क़ि दीवाना बनना ही पड़ेगा । ये इश्क़ है । दीवानगी है । जन्नते-सुरूर है । ये खुद ख़ुदा का ख़ुमार है । जो बेकसी है , प्यार है । और इस प्यार का आग़ाजनाज़ुक उम्र से निगाहों की तपन से मज़बूर । ख्वाहिशों के सफ़र में ऱप्ता ऱप्ता साहिलों पर फ़िसलते क़दम । रिस्तों की सुरुआत । वो अज़नबी और फ़िर चाहतों का अनजाना सैलाब । वो मदहोश चितवन । 

रात में बनती तस्वीरें । और तसवीरों पर सजी मुस्कान । वो बेख़ौफ़ इशारे । अकेलेपन की बेवसी । तब जाकर सुरु होती है दास्ताँ ऐ मुहब्बत । खिलते फूल और गुनगुनाती शाम । शाम ही नही ,अंधेरों के झरोखें उकेरते है वो चेहरा जिसकी चाहत है । यहा से सुरु होती है तालाश ऐ जिंदगी । यही से भटकती है राहे । यही से मिलती है जन्नते-झलक । इस नये एहशास का वज़्न दिल को तसल्ली देता है । अग़र मुलाकातों का सिलसिला जाऱी रहा तो शख़्स दर शख़्स आजमाइसो के दौर का भी आगाज़ यही से होता है । और तब निकलती है एक आह एक तड़पन । और तब बनती है ग़ज़ल ।।
           
समन्दर डूब सब निकले बैठे हम किनारे थे ।
बुझी न प्यास ऐ साकी इशारे ही इशारे थे ।।

  शेष फिर........
               .... रकमिश सुल्तानपुरी

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

ग़ज़ल।यकीं खुद पे हमारा है ।


       ग़ज़ल। यकीं ख़ुद पे हमारा है ।

बिछड़कर जा रहे मुझसे बची यादें सहारा है ।
शरारत से भरे दिन की तरफ मेरा इशारा है ।।

मिले थे हमसफ़र बनकर मग़र जाना तुम्हे होगा ।
हमारी है यही मंजिल तुम्हारा तो किनारा है ।।

यक़ीनन आप जायेंगे तो दिल मेरा भी रोयेगा ।
ख़ुशी तुमको मिले सारी मुझे ये दर्द प्यारा है ।।

हुई जो भूल मुझसे तो उसे तुम दिल पे मत लेना ।
सलीक़ा जो उचित समझा तुम्हे मैंने निखारा है ।।

सजेगी फ़िर यहाँ महफ़िल कभी हम साथ न होंगे ।
मग़र चेहरे पे हर चेहरा लगेगा कि तुम्हारा है ।।

ग़मो के और भी झोंके "रकमिश" हैं तुम्हे सहने ।
मग़र मंजिल मिले तुमको यकीं खुद पे हमारा है ।।

                     ©रकमिश सुल्तानपुरी

शनिवार, 30 जनवरी 2016

ग़ज़ल।भले नफ़रत मिले मुझको।

    ग़ज़ल।भले नफ़रत मिले मुझको।

दुआ हर बार दूँगा मैं भले नफ़रत मिले मुझको ।
लगा कर दिल न तोडूंगा भले राहत मिले मुझको ।।

अग़र तू भाँप कमज़ोरी मुझे दिल का हवाला दे ।
कभी दिल की सुनूंगा न भले मोहलत मिले मुझको ।। 

अभी तक याद है दिन वो तेरी बदसुलूकी का ।
कभी न भूल पाउगा भले इज्जत मिले मुझको ।। 

मिला इस बार भी धोख़ा तो अब फिर से मनाना क्या ।
मुझे मंजूर है तन्हा भले मन्नत मिले मुझको ।।

शहर ये छोड़ जाऊँगा जरा बदनाम हूँ तो क्या ।
तेरे दर पे न आऊँगा भले हुज्जत मिले मुझको ।। 

मेरी इक शर्त है "रकमिश" वफ़ा के नाम पर सुन ले ।
साहिल पर न आउगा भले जन्नत मिले मुझको ।।  

             ©रकमिश सुल्तानपुरी 

शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

ग़ज़ल।ज़माने से मिला धोख़ा।

    ग़ज़ल।ज़माने से मिला धोख़ा।

तुम्हारे साथ पल दो पल बिताने से मिला धोखा ।
जुनूने इश्क़ में दिल को लगाने से मिला धोख़ा ।।

लुटा दी हुश्न-ऐ-दौलत यकीं करके मुहब्बत पर ।
मग़र हर एक वादे को निभाने से मिला धोखा ।।

अग़र थी हुश्न की चाहत तो पहले ही बता देते ।
ख़िदमत-ऐ-पेश कर देते छिपाने से मिला धोख़ा ।। 

मुझे मालूम न था कि यहा हर शख़्स है प्यासा ।
लगा हमदम,लुटेरा ,हर दिवाने से मिला धोख़ा ।।

फ़रेबी लोग है फ़ैले ये साहिल से समन्दर तक ।
बने नासूर ज़ख्मो को दिखाने से मिला धोख़ा ।। 

तबाही हुस्न की होगी यक़ीनन प्यार कर देख़ो ।
कहा तक नाम लूँ "रकमिश"ज़माने से मिला धोख़ा ।।

                     ©रकमिश सुल्तानपुरी 

गुरुवार, 28 जनवरी 2016

ग़ज़ल।कोई साज़िश नही होती।

   ग़ज़ल।कोई साज़िश नही होती।

वसूलों पर चले कोई मुझे रंजिश नही होती ।
तेरा दिल टूट जाये ये मेरी कोशिस नही होती ।

अग़र समझो कि प्यासा हूँ तुम्हारे हुश्न का साकी ।
तो सच है ,कि मुहब्बत में कोई बंदिश नही होती ।।

तरस कर इश्क़ में तेरे किसी दिन भूल जाऊँ मैं  ।
सहे फ़िर गम भरे लम्हें मेरी ख़्वाहिश नही होती ।।

यकीनन रूह तक मेरी है क़ायल रूप पर तेरे ।
तड़पकर एक हो जाते अग़र वर्जिश नही होती ।।

चलो मैं मान लेता हूँ ,तुम्हे डर है ज़माने का ।
मग़र है इश्क़ की रश्मे ,कोई साज़िश नही होती ।।

"रकमिश"तुम चले आओ ये साहिल तक विराना है ।
यहा है भीड़, तन्हाई ,कोई मजलिश नही होती ।।

                  ©रकमिश सुल्तानपुरी  

शनिवार, 23 जनवरी 2016

ग़ज़ल।सकूनत मिल गयी मुझको।

   ग़ज़ल।सकूनत मिल गयी मुझको ।

तेरी नज़रों की चितवन से सकूनत मिल गयी मुझको ।
तुम्हारे रूप की महफ़िल हुक़ूमत मिल गयी मुझको ।

ग़मों के ही समुन्दर में ,मिला जो भी, डुबोया था ।
अभी कुछ दर्द होगा पर ग़नीमत मिल गयी मुझको ।

अग़र माने तो क्यों माने कि तुम भी जख़्म ही दोगे ।
मिले ज़ख्मो के ही दरम्यां कीमत मिल गयी मुझको ।

तलाशे-इश्क़ साहिल पर मिला जो भी दिया धोखा ।
तेरे चेहरे की रौनक में नशीहत मिल गयी मुझको ।

नतीजें और क्या होंगे दिलों में जख़्म से ज्यादा ।
तुम्हारी याद की दुनियां वशीयत मिल गयी मुझको ।  

पड़ा बेहाल था "रकमिश" साहिल पर थी तन्हाई ।
दवा-ऐ-दर्द तुम आये शिनाखत मिल गयी मुझको ।

                   ©रकमिश सुल्तानपुरी

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...