सोमवार, 16 नवंबर 2015

ग़ज़ल।आराम नही आया तो ।

     ग़ज़ल।आराम नही आया तो।

आज तेरा ख़त ,तेरा पैगाम नही आया तो ।
टूट ही गया दिल, मेरा नाम नही आया तो ।

ख्वाबो के शहर में अब धुएं उठने लगे हैं ।
मैं तुमसे मिलने इक शाम नही आया तो ।

फर्क तो पड़ ही गया चाहतो में दूरियों से ।
बढ़ गये दिल के भी दाम, नही आया तो ।

प्यार तो तेरा इक जूनून था, ख्वाहिस थी ।
दर्द मिला दिल को इनाम ,नही आया तो ।

साहिलों से मैं चला था खोजने मंजिल कोई ।
साहिलों पर रह गया गुमनाम ,नही आया तो ।

आ ही जाता मैं तेरे  काशिस, तेरे पहलू में । 
छलक ही गया हुश्न -ऐ -जाम नही आया तो ।

फ़िक्र न थी ,दर्द था तुझसे बिछड़ जाने का ।
पर तुम तो लगा बैठे इल्जाम नही आया तो ।

हो रहे थे दर्द में नासूर मेरे दोस्त "रकमिश" ।
फिर कर गये बदनाम आराम नही आया तो ।

                               ..... राम केश मिश्र

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

ग़ज़ल । ख़ुद रौशनी जलने लगी है ।

   ग़ज़ल । ख़ुद रोशनी जलने लगी है ।
             (दीपावली विशेष)

अब रोशनी क्यों जुल्म की ये बन्दगी करने लगी है ।
आजकल क्यों चाल दुनियां दोगली चलने लगी है ।।

मन्नतो से कुछ नही होगा जलाना दीप तुमको ।
अंधकारों की निकम्मी बेरुखी बढ़ने लगी है ।।

मजलिसों में ,महफ़िलो में , साहिलों पर चल दिखा दें ।
है रुआँसे लोग सब आँख भी भरने लगी है ।।

हर तरफ़ है ख़ौफ़ के मंज़र पड़ा गुमनाम साहिल ।
दर्द की आहों पर छायी बेबसी पलने लगी है ।।

क्या मिलेगा मौत से जादा मुसाफ़िर सोच ले तू ।
उम्र का मत कर भरोसा जिंदगी छलने लगी है ।।

हौंसला रख पथ्थरों में भी ख़ुदा मिलता यहा पर ।
चल दिखा दे रास्ते अब अस्मिता मरने लगी है ।।

चल जला ले रौशनी अब हम मिशाले प्यार की ।
बढ़ रही है गम की रौनक़ शाम भी ढलने लगी है ।।

फ़िक्र मतकर तू चले तो कारवाँ भी चल पड़ेगा ।
चलके 'रकमिश' देख लो ख़ुद रौशनी जलने लगी है ।।

                      .......राम केश मिश्र

शनिवार, 7 नवंबर 2015

ग़ज़ल।हर शख़्स गुनेहगार है ।

  ग़ज़ल । हर शख़्स गुनेहगार है।

इश्क़ और प्यार से अब उठ गया एतबार है ।
जिसने भी डाला नज़र हर वो शख़्स गुनेहगार है ।।

है सौदागरों की महफ़िल कभी भूलकर न आना ।
हो संगदिल या हमदिल सब एक से गद्दार हैं ।।

कर रहा होगा कहीँ पर साजिशे तेरे प्यार में ।
जो तेरे लिये तन्हाइयों में आज बेक़रार है ।।

वक्त की पैमाइसे है ,वक्त की नुमाइसे सब ।
जब वक्त तेरा न रहा तब दिल तेरा बेकार है ।।

लुट रहा या लूटता है खुद पता जिसको नही ।
रास्ता जो भी रहा हो पर ग़म यहां तैयार है ।

बन मुसाफ़िर फ़िर रहे है रहबरों की चाह में ।
मुफ़लिसी वे क्या करेगे जो खड़े मजधार है ।।

साहिलों पर टिक न पाते ग़म भरे जज़बात वो ।
'रकमिश' इरादे इश्क़ में ख़ुदा ही मददग़ार है ।।

                      .....R.K.MISHRA

ग़ज़ल।हर शख़्स गुनेहगार है ।

  ग़ज़ल । हर शख़्स गुनेहगार है।

इश्क़ और प्यार से अब उठ गया एतबार है ।
जिसने भी डाला नज़र हर वो शख़्स गुनेहगार है ।।

है सौदागरों की महफ़िल कभी भूलकर न आना ।
हो संगदिल या हमदिल सब एक से गद्दार हैं ।।

कर रहा होगा कहीँ पर साजिशे तेरे प्यार में ।
जो तेरे लिये तन्हाइयों में आज बेक़रार है ।।

वक्त की पैमाइसे है ,वक्त की नुमाइसे सब ।
जब वक्त तेरा न रहा तब दिल तेरा बेकार है ।।

लुट रहा या लूटता है खुद पता जिसको नही ।
रास्ता जो भी रहा हो पर ग़म यहां तैयार है ।

बन मुसाफ़िर फ़िर रहे है रहबरों की चाह में ।
मुफ़लिसी वे क्या करेगे जो खड़े मजधार है ।।

साहिलों पर टिक न पाते ग़म भरे जज़बात वो ।
'रकमिश' इरादे इश्क़ में ख़ुदा ही मददग़ार है ।।

                      .....R.K.MISHRA

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

।ग़ज़ल।आजमाते जा रहे सब।

  ।ग़ज़ल।आजमाते जा रहे सब।


जिंदगी में दोस्ती के गीत गाते जा रहे सब ।
पर दोस्तों की कदर ही अब भुलाते जा रहे सब ।।

बढ़ रही तादाद अपने दोस्तों की हर पहर ।
पर न जाने ठोकरों से जख़्म पाते जा रहे सब ।।

मर्ज की लेते दवा पर मर्ज अब बढ़ने लगा है ।
दर्द है ,तन्हाइयां पर मुस्कुराते जा रहे सब ।।

है यहाँ सब गम से बोझिल अपने ही हालात से ।
तर्ज मिलता ही नही पर गुनगुनाते जा रहे है ।।

न समझ पाये कभी जो प्यार की बारीकियों को ।
दिल के टुकड़े हो गये पर दिल लगाते जा रहे है ।।

इश्क़ और दोस्ती में शर्त तो होती नही है ।
न जाने फिर कौन सा वादा निभाते जा रहे सब ।।

साहिलों पर देखता हूँ रकमिश" तेरी दास्ताँ मैं ।
तोड़कर दिल कह रहे की आजमाते जा रहे सब ।।

                           .....R.K.MISHRA

रविवार, 1 नवंबर 2015

यहा खुद की नही चलती ।ग़ज़ल ।

   ग़ज़ल.यहा खुद की नही चलती ।

करोगे क्या शिकायत कर तुम्हारी है नही गलती ।।
ग़मो का नाम दुनिया है यहा खुद की नही चलती । 

जो तेरे दोस्त सारे थे जिन्हें तुम छोड़ आये हो ।
मिलें उनको मनाना तुम उमर फिर से नही मिलती ।

किसी की आँख का आँशू कभी बनकर न बहना तुम  ।
जरा सा प्यार देने से ख़ुशी तेरी नही मरती ।।

न जाने कौन सी फिसरत मची है आज़माने की ।
इल्म दिल पर नही होता आह उनकी नही भरती ।।

करो तुम फक्र सुन लेकिन बचे दो चार दिन ही है । 
वक्त फिर से न आयेगा  उम्र भी तो नही बढ़ती ।।

कही मुरझा न जाये दिल तुम्हारे खौफ़ से साथी ।
बहारें रोज न आती कली दिल की नही खिलती ।।

यकीनन तुम भी पाये हो धोख़ा प्यार में रकमिश"
मग़र दिलफेक दुनिया में ख़ुशी सबको नही मिलती ।। 

                          ---R.K.MISHRA

शनिवार, 31 अक्टूबर 2015

तेज़ाब उभर आता है ।ग़ज़ल ।

     तेजाब उभर आता है ।ग़ज़ल

मैं तो खामोश हूँ पर जबाब उभर आता है  ।। 
बीते लम्हों का इक ख्वाब उभर आता है  ।।

अब जा, चली जा तू मेरी नजर से दूर कही ।।
तुझे देखूं तो दर्द का शैलाब उभर आता है ।।

बात तो बिल्कुल मत कर तू अपनी बेगुनाही की ।।
गुनेहगार मैं भी नही बेताब उभर आता है ।।

अब दहकते है शोले खुद व् खुद तन्हाइयो में ।
तू मिले तो आँखों में आफ़ताब उभर आता है ।।

माना कि तेरी यादो में जन्नत की झलक मिलती है ।
ख़ुशनुमा चेहरा वो गुलाब उभर आता है ।।

जो भी मिला सुकून बनकर तोड़ ही गया दिल ।
अब हर कोई बेवफा ज़नाब उभत आता है ।। 

जा चली जा रकमिश" हर हाल भुला देगा तुझे ।।
पर भूलने की चाह से तेज़ाब उभर आता है ।

                           ---R.K.MISHRA

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

ग़ज़ल.दौलत पर नही मरती ।

      ग़ज़ल.दौलत पर नही मरती ।

ये दुनियां संगदिल निकली मुहब्बत क्यों नही करती ।
फ़रेबी है अपनेपन की दौलत पर नही मरती ।।

चलो तुमको दिखाते है दवाओ की दुकानों में ।
तड़पते लोग रहते है दवा उनको नही मिलती ।।

बने मज़दूर बच्चों पर तरस अब हम नही खाते ।
करे दिन रात मेहनत पर आह उनकी नही थमती ।। 

जहा देखो वही पर अब रिश्वत की वसूली है ।
न जाने शख्शियत क्या है जेब उनकी नही भरती ।

न जाने कौन सी मिट्टी से बने है लोग दुनिया के ।
भलाई की परत बेशक़ अब उनपे नही चढ़ती ।।

यहाँ पर प्यार के भी तो अज़ब किस्से कहानी हैं ।
हवस बढ़ती ही जाती है कली दिल की नही खिलती ।।

उजाला नाम दे देकर अँधेरा खूब बढ़ाते है ।
दीवाली रोज आती पर दिलों के तम नही  हरती ।।

यहाँ के लोग रोते है खुदी के दर्द से ग़ाफ़िल ।।
ख़ुशी की देखकर रकमिश" ख़ुशी उनको नही मिलती ।। 

                      ---- R.K.MISHRA

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

ग़ज़ल.मै एक दिया था

        ग़ज़ल.मिटा दिया गया हूँ ।।

मैं एक दिया था मिटा दिया गया हूँ .
उनकी ख़ैरात था लुटा दिया गया हूँ .

हौसला रखता था ये दिल मुहब्बत का .
मैं एक मुकाम था मिटा दिया गया हूँ .

अब वही लिखता हूँ तन्हा के आंशुओं से .
मुहब्बत में जो भी सिखा दिया गया हूँ

तब तो मेरे नाम की तारीफ होती थी .
अब बदनाम इशारों से दिखा दिया गया हूँ .

दर व् दर की ठोकरों से आज साहिलों पर .
बेकार आंशुओं सा गिरा दिया गया हूँ .

अब चर्चाओं में मेरा जिक्र नही होता .
पुरानी यादों सा मैं भुला दिया गया हूँ .

मुहब्बत की एक लम्बी दास्ताँ था मैं .
आज बेनाम ख़त सा जला दिया गया हूँ .

मिलता था बेकरारियो में भरोशा और हौंसला .
रुसवाइयों में शराब ऐ गम पिला दिया गया हूँ  .

सकून आ गया जब दर्द बढ़ गया हद से .
अब ग़मो के मंजर में डुबो दिया गया हूँ .

रकमिश" मेरी जिंदगी मुहब्बत ऐ मिसाल थी .
अब बदनाम और बुझदिल बता दिया गया हूँ .

                          ----R.K.MISHRA

ग़ज़ल.मै एक दिया था

        ग़ज़ल.मिटा दिया गया हूँ ।।

मैं एक दिया था मिटा दिया गया हूँ .
उनकी ख़ैरात था लुटा दिया गया हूँ .

हौसला रखता था ये दिल मुहब्बत का .
मैं एक मुकाम था मिटा दिया गया हूँ .

अब वही लिखता हूँ तन्हा के आंशुओं से .
मुहब्बत में जो भी सिखा दिया गया हूँ

तब तो मेरे नाम की तारीफ होती थी .
अब बदनाम इशारों से दिखा दिया गया हूँ .

दर व् दर की ठोकरों से आज साहिलों पर .
बेकार आंशुओं सा गिरा दिया गया हूँ .

अब चर्चाओं में मेरा जिक्र नही होता .
पुरानी यादों सा मैं भुला दिया गया हूँ .

मुहब्बत की एक लम्बी दास्ताँ था मैं .
आज बेनाम ख़त सा जला दिया गया हूँ .

मिलता था बेकरारियो में भरोशा और हौंसला .
रुसवाइयों में शराब ऐ गम पिला दिया गया हूँ  .

सकून आ गया जब दर्द बढ़ गया हद से .
अब ग़मो के मंजर में डुबो दिया गया हूँ .

रकमिश" मेरी जिंदगी मुहब्बत ऐ मिसाल थी .
अब बदनाम और बुझदिल बता दिया गया हूँ .

                          ----R.K.MISHRA

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...