मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

2.दिवाने याद रहते है .

    ।।ग़ज़ल।।दीवाने याद रहते है।।

तेरी नजरो की ख़ामोशी ,  तराने याद रहते है ..
लगे जब हम कभी तुमको मनाने याद रहते है..

भले खुद को लुटा दे तू हमारी शौक में हमदम .
मग़र वो दर्द के तेरे जबाने याद रहते है ...

बहुत कम फ़ासले थे पर कभी कोशिस न की तुमने ।।
न मिलने के तुम्हारे सब बहाने याद रहते है ।। 

हमारे दिल की राहो को तुम्हारा यूँ कुचल जाना .
नही अब जख्म होते पर पुराने याद रहते हैं ..

कभी आना तो देखोगे नही बाक़ी है तन्हाई ..
मग़र तेरे गम के मंजर के तराने याद रहते है ..

करो तुम लाख कोशिस पर मुझे न भूल पावोगे .
खुदा भूले तो भूले पर दीवाने याद रहते है ..

अभी भी वक्त है "रकमिश" इरादा हो चले आना ..
तेरे आगोश के लम्हे सुहाने याद रहते है .  .

                      ×××

1.बेदम पड़ी थी रोशनी

    ।।ग़ज़ल।।बेदम पड़ी थी रौशनी।।
                             राम केश मिश्र

चाँदनी रात में सनम पड़ी थी रोशनी ।।
वक्त बेवक्त मौसम पड़ी थी रोशनी ।।

पहुचते पहुँचते तीरे नजर में खो गयी ।
था पहला अंदाज, कम पड़ी थी रोशनी ।।

चाँद तारे चल रहे थे बेवफा के साथ ।
थी चमक मद्दिम, हरदम पड़ी थी रोशनी ।।

चाँद चमका ,हुस्न चमका, जुल्फ़े चमक गयी ।
कश्मकश दिल में हुयी जम पड़ी थी रोशनी ।।

उस नज़र की इक किरन आ मेरे दिल में चुभी ।
थी ज़िगर में उलझनें तो थम पड़ी थी रोशनी ।।

थी मन्द मुस्कान पर वह जिगर में आ चुभी ।
दिल गया हालात से ,गरम पड़ी थी रोशनी ।।

इक कदम उनका बहकना इक क़दम मेरा ।
दो फ़ासले बीच तक संगम पड़ी थी रोशनी ।।

चाँद सूरज का सबेरा शमा भी सरमा गयी ।
फ़ासले जब मिट गये पुरनम पड़ी थी रोशनी ।।

वही चाँद, वही चाँदनी वही शबनम वो फ़िजा ।
थी वही मंजर वहा पर नम पड़ी थी रौशनी ।।

"रकमिश"तेरी याद में रात भर जागा किया ।
उस नज़र के बाद तो बेदम पड़ी थी रोशनी ।।

                      ×××

।।शेर।।ख़ामोशियाँ।।

            ।।शेर।।ख़ामोशियाँ।।
                            R.K.MISHRA

तेरा खामोश होना तो मुहब्बत का कोई सुबूत नही ।।
यहा गुनाह करके भी लोग बड़े खामोश रहते है ।।

हुनर वे जानते होंगे मेरा खामोशिया पढ़ने का ।।
उन्हें शक है इसी से अब चेहरा वो छिपाते है ..

जरा तुम फांदकर देखो मुहब्बत में दीवालों को ।।
ख़ामोशी के न जाने फिर कितने मोड़ आयेगे ।।

बहुत से मोड़ आते है दरिया से किनारों तक ।।
तन्हा गम ख़ामोशी तो महज है राह मंजिल के .

किसी से प्यार के दरम्यां कभी खामोश मत रहना ..
तेरा ख़ामोश रहना ही उसे सितमगर बना देगा ..

तेरी नजदीकियों से तो ग़मो के फ़ासले अच्छे .
वहा खामोश होंगे तुम मुझे परवाह न होगी .

तेरा खामोश रहना भी तेरी रौनक बढ़ा देता .
मग़र आसान इससे दिल की राह न होगी ....

किसी दिन देख लेना तुम हमारे दिल के दर्पण में .
तुम्हारा रूप ही तुमसे हाले दिल सुना देगा ..

                                  ×××

सोमवार, 12 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।।मेरा किरदार पढ़ लोगे।।

   ।।ग़ज़ल।।मेरा क़िरदार पढ़ लोगे।। 
                            R.K.MISHRA

मेरी खामोशियो में भी मेरा इज़हार पढ़ लोगे .
कभी दिल से जरा समझो मेरा किरदार पढ़ लोगे .

न साहिल है न मंजिल की मुझे परवाह रहती है .
मग़र है आँख का दरिया छलकता प्यार पढ़ लोगे .

जरा तुम रोककर कर देखो हमारे आँख के आंशू .
झलकती झील में अपना अलग संसार पढ़ लोगे..

अभी तक बात करते हो हमेसा ही इशारों से . 
जरा आग़ोश में आओ दिली झंकार पढ़ लोगे . 

महज़ ये फ़ासले ही है जो हमको दूर करते है ..
यकीनन पास आये तो मेरा इनकार पढ़ लोगे ..

अग़र है शौक तुमको तो जाते हो चले जाओ .
ज़रा फिसले मुहब्बत में ग़मो की मार पढ़ लोगे ..

नही होते है पैमाने किसी से प्यार करने के ..
खुली दिल की किताबो में लिखा एतबार पढ़ लोगे..

                        ×××

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।।गर्म शोले उगलती है।।

  ।।ग़ज़ल।।गर्म शोले उगलती है।।
                             R.K.MISHRA

बरसकर सूख जाते है पसीनों की न चलती है  .
तपिश इस धूप की देखो सेवारो में मचलती है .

हमारे खेत में आकर जली फ़सलो को देखो तुम ,
यहाँ की मिट्टियाँ है तप्त गर्म शोले उगलती है  .

न टहनी हैं ,न पल्लव हैं ,न आशा फूल की इनमे ,
पत्तिया सूखकर लावा बनती है लटकती है .

खड़ा मेड़ो पर रहता हूँ खुरपी हाथ में लेकर ,
न घासें है न घासों में कोई रौनक़ उभरती है .

लगाकर पम्प से पानी भरता रोज इनको हूँ  ,
करूँ मैं लाख़ कोसिस पर धरा दिन रत जलती है .

निगाहें उठ ही जाती हैं जहाँ धुएं उमड़ते है ,
चिमनिओ के,नही बदल की छाया भर उमड़ती है .

अगर हो आँख में पानी तो भर दूँ आज इनको मैं ,
मग़र सूखी इन नदियो में निराशा ही झलकती है .

करू जी जान से मेहनत यही मिलता किसानी में,
करूँ किससे शिकायत मैं गर्म आहे निकलती है  .

                        ×××

।।ग़ज़ल।।गर्म शोले उगलती है।।

  ।।ग़ज़ल।।गर्म शोले उगलती है।।
                             R.K.MISHRA

बरसकर सूख जाते है पसीनों की न चलती है  .
तपिश इस धूप की देखो सेवारो में मचलती है .

हमारे खेत में आकर जली फ़सलो को देखो तुम ,
यहाँ की मिट्टियाँ है तप्त गर्म शोले उगलती है  .

न टहनी हैं ,न पल्लव हैं ,न आशा फूल की इनमे ,
पत्तिया सूखकर लावा बनती है लटकती है .

खड़ा मेड़ो पर रहता हूँ खुरपी हाथ में लेकर ,
न घासें है न घासों में कोई रौनक़ उभरती है .

लगाकर पम्प से पानी भरता रोज इनको हूँ  ,
करूँ मैं लाख़ कोसिस पर धरा दिन रत जलती है .

निगाहें उठ ही जाती हैं जहाँ धुएं उमड़ते है ,
चिमनिओ के,नही बदल की छाया भर उमड़ती है .

अगर हो आँख में पानी तो भर दूँ आज इनको मैं ,
मग़र सूखी इन नदियो में निराशा ही झलकती है .

करू जी जान से मेहनत यही मिलता किसानी में,
करूँ किससे शिकायत मैं गर्म आहे निकलती है  .

                        ×××

बुधवार, 7 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।।नबाब तेरे दिल का।।

                               R.K.MISHRA

कितनी भी तारीफ़ करू मैं,ज़नाब तेरे दिल का .
अब तक न मिल सका कुछ हिसाब तेरे दिल का .

तू भी तो बेचैन है मेरी काशिश के शाये में ,
और मैं भी तो हो गया हूँ बेताब तेरे दिल का . 

अब ये वक्त की बंदिशें मुझे तकलीफ़ देती है .
न जाने कब से देखा है बस ख़्वाब तेरे दिल का .

तुम्हारे हुस्न की रंगत में डूबकर आया हूँ मैं,
भला कब तक महकेगा वो गुलाब तेरे दिल का .

अब बेसब्र हो गया हूँ बस तू तार तार कर दे ,
मैं बनकर दिखा दूंगा आफ़ताब तेरे दिल का .

गुनाह तू समझे तो हर सज़ा मंज़ूर मुझको हैं ,
बाक़ी होगा वो दर्द भी लाज़बाब तेरे दिल का . 

ये नशा तेरी दीवानगी का सहा नही जाता है ,
अब इल्म कर ले मैं ही हूँ नबाब तेरे दिल का .

                         ...

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।।मरीज़ तो था ही मैं ।।

  ।।ग़ज़ल।।मरीज़ तो था ही मैं।।

                        R.K.MISHRA
                       

राहे मुहब्बत का मरीज़ तो था ही मैं .
साथ तेरा मिला ख़ुशनसीब तो था ही मैं.

एक लम्हा प्यार का भी मुझे न दे सके ,
फर्क न पड़ता तुम्हे हबीब तो था ही मैं .

सकून मिल जाता तुम्हे भी अश्क़ की बरसात से ,
इश्क़ में गम की दवा तबीज तो था ही मैं .

हर सज़ा मंजूर थी और क्या लुटता मेरा. 
दिल भी अपना न हुआ गरीब तो था ही मैं .

बाहों में लिपटकर रो लेने दिये होते मुझे ,
फ़ासले कम ही थे और क़रीब तो था ही मैं .

पर दिखा कर इश्क़ की झूठी मुझे नुमाइसे ,
कत्ल किये जज़्बात का नाचीज़ तो था ही मैं .

हर ग़ज़ल,हर नज़्म तेरी आह का शैलाब है ।
वज़्न तेरे गम का है अजीज तो था ही मैं .

                        ...

सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।।सज़ा किसने नही पायी।।

।।ग़ज़ल।।सज़ा किसने नही पायी।।

किसी को ग़म दिया बेसक किसी की आँख भर आयी ।।
तेरे उन शुर्ख होठो की सज़ा किसने नही पायी ।।

तेरी नज़रो की छाया में सकूने इश्क़ फ़रमाते ।।
तेरी रश्मे मुहब्बत में कसम किसने नही खायी ।।

पलक झपके अदा तेरी कि पहले ही बदलती थी ।।
न समझे लोग नाज़ुक दिल मिली सबको ही तन्हाई ।।

गयी तू लूट महफ़िल को ज़रा सी रौशनी देकर ।।
बड़ी तकलीफ़ देती है तेरी बेबाक़ तन्हाई ।।

मेरा वो शक सही निकला दिलो के खेल होते है ।।
यहा सजती मुहब्बत में गमो के नाम सहनाई ।।

उन्हें आगाह कर दू मैं जिन्हें है नाज़ जिश्मो पर ।।
किये उनके गुनाहो की करूँ कब तक मैं भरपाई ।।

मग़र ये याद रख हमदम सज़ा तुमको भी है वाज़िब ।।
तेरा मज़ाक कर देगी वो तेरे दिल की मंहगाई ।।

                            R.K.MISHRA

रविवार, 4 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।।मेरी जुर्रत नही होती।।

   ।।ग़ज़ल।।मेरी जुर्रत नही होती।।

हमारे आँख के आंशुओं की कीमत नही होती ।।
अब ग़म और तन्हा से दिक्कत नही होती ।।

प्यार के सारे हुँनर मैं सीख़कर रोया किया ।।
इस इश्क़ में चाहतो की इज्जत नही होती ।।

प्यार को इक शौक़ सा सब पाल लेने है लगे ।।
अब अज़नबी दर अज़नबी हुज्जत नही होती ।।

प्यार में जब दूरियाँ बढ़ गयी तो खो गये ।।
अब इंतजरो के लिये फुर्सत नही होती ।।

सब्र करता कब तलक मैं साहिलों पर खो गया ।।
दर्द सुनते लोग सब पर मोहलत नही होती ।।

इश्क़ के इस दरमियां मैं हकीमो से मिला ।।
कह दिये तहक़ीक़ कर कि मन्नत नही होती ।।

या इलाही दर्द तेरा बन गया नासूर अब ।।
अब मेरे इन मरहमो से राहत नही होती ।।

हो सके आ देख लेना साहिलों पर दर्द मेरा ।।
अब इश्क़ करने की मेरी जुर्रत नही होती ।।  

                       R.K.MISHRA

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...