रविवार, 23 मार्च 2014

*नज़र*

                  *नज़र*

कभी जिनको नजरों मे छिपा रखा था मैंने  ,
वही गैरो के साथ मुस्कुराते नज़र आयें हैं ।।1।।
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बड़ी मुद्दत थी उन्हें दिल मे बसाने की कब से,
नज़र मिली तो चेहरा छिपा बैठे थे ।।2।।

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तखलीफ़ तो हुई उनकी बेहयाई से ,
उन्हें तो मौका मिला तन्हाई मिटा लेने का ।।3।।
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बेकसूर थी नजरें जो उनकी चाह कर बैठी ,
कसूर तो दिल का हैं जो उन्हें अपना समझ बैठा ।। 4।।    

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