सोमवार, 23 जनवरी 2017

ग़ज़ल।ख्वाहिशे तमाम न थी ।

      ग़ज़ल ।। ख्वाहिशें तमाम न थी ।। 

जिंदगी थी रेत सी बन्दिसे तमाम न थी ।
प्यार के आग़ोश में ख्वाहिशे तमाम न थी ।।

कट गये वो दर्द के लम्हे ज़रा सा घाव दे ।
चुप रहा हर जख़्म पर नुमाइशे तमाम न थी ।।

रह गया ख़ामोश मैं वो दग़ा करते रहे ।
प्यार में कायल मेरी फ़रमाइशें तमाम न थी ।।

था बड़ा नादान दिल उनको समझ बैठा ख़ुदा ।
था यकीं मेरे प्यार में आजमाइसे तमाम न थी ।।

रकमिश तुम्हारी याद के आंसू बड़े अनमोल है ।
पर क्या करे दिल गमसुदा रहाईशे तमाम न थी ।।

                                    राम केश मिश्र

सोमवार, 9 जनवरी 2017

ग़ज़ल ।विंदास है कुहरा ।

            ग़ज़ल।विंदास है कुहरा।

आलम ठंडी का आसपास है कुहरा ।
अपनी इस जवानी में विंदास है कुहरा ।।

कुछ समय के लिये आ जाती निशाँ उतरकर ।
कभी हम पसन्द तो कभी विनास है कुहरा ।।

अलावे जलाकर बैठे लड़के जवान लोग ।
बूढ़े भी कहते अब अनायास  है कुहरा ।।

इक किरण आकर रौशन करती ज़मी को ।
देख सूरज की तपिश ख़लास है कुहरा ।।

गर्मी जब बढ़ी कुहरे की परेसान है सूरज ।
देख लोगो की परेसानी उदास है कुहरा ।।

भला सूरज के सामने कहा तक लड़ता वह ।
हुआ बेबस, लाचार, हतास है कुहरा ।।

रात से है दुश्मनी सुबह तक आता नही ।
समय बदला हो गया निरास है कुहरा ।। 

                            © राम केश मिश्र

ग़ज़ल।मैं भी सितारा था।

             ग़ज़ल।मैं भी सितारा।

मैं भी था सितारों में जगमगाने वालों ।।
थम जाने दो आंशू गीत गाने वालो ।।

अपने लब्ज़ो की बात तो बया कर दू ।
सुना देना तुम भी किस्सा सुनाने वालों ।।

मुश्किलें बहुत हैं अब तो समझ जाओ ।
कब समझोगे मुझको गम में रुलाने वालों ।।

जिन्दा रहा तो जिंदगी बेमौत मार डाली ।
सुन मेरे ज़नाज़े पर यूँ मुस्कराने वालों ।।

मेरी ह्मवफ़ा पर यक़ीन नही है तुमको ।
अपनी बेवफ़ाई पर भी मुस्कराने वालों ।।

अपनी आज़ादी की खुशियां मना लेना तुम ।
आग मद्दिम ही लगाना जिन्दा जलाने वालों ।।

कुछ संगदिल भी देखेगे उस धुँये का जलवा ।
आ गये थे कब्र पर खुसबू चढ़ाने वालों ।।

कब तलक लड़ता मैं वक्त की उस मार से ।
दुश्मनों से मिल गये मुझको जिलाने वालों ।।

जनाजा तो निकल गया इंतक़ामे प्यार में ।
तुम्हारे सिर्फ आँसू ,ऐ आंशू बहाने वालों ।।

बुझेगा नही धुँआ ये आकाश तक जायेगा ।
सितारों में रहूंगा मैं ऐ मुझको मिटाने वालों ।

कही न झुके सर मुहब्बत के शिवा रकमिश ।
देता हूं दुआ कब्र पर सर को झुकाने वालों ।। 

                               राम केश मिश्र

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

ग़ज़ल।तेरी वफ़ाई की कहानी भी ।

ग़ज़ल।तेरी वफाई की कहानी भी ।।

जलेगा दिल जलाऊँगा मुहब्बत की निसानी भी ।
लिखूंगा आज मैं तेरी वफाई की कहानी भी ।।

मैं तेरे कमसिनी ख़ंजर के ज़ख़्मो को भुला बैठा ।
तुम्हे तो याद ही होगा मेरे आँखों का पानी भी ।।

मैं शातिर हूं या क़ातिल हूं खुदा हूं या गुनाहों का ।
यक़ीनन पड़ रही मुझको वही कीमत चुकानी भी ।।

सताता था मुझे हर पल तेरी खामोशियो का डर ।
दुनियां हो चुकी तेरी जवानी की दीवानी भी ।।

पलटकर देख़ जाते तो तुम्हारा क्या बिगड़ जाता ।
तड़पकर रो रही होती तेरी यादें रूहानी भी ।।

नज़र ऐ जख़्म था गहरा चुभा नस्तर सा वो सदमा ।
मग़र बेशक मुझे थी वो मुहब्बत आजमानी भी ।। 

रुलाया क्यों मुझे रकमिश सहारा गैर का पाकर ।
ताज़ी हो गयी यादें सदियों की पुरानी भी ।।

                     राम केश मिश्र "रकमिश"

शनिवार, 3 दिसंबर 2016

ग़ज़ल।मुहब्बत वो नही होती ।

       ग़ज़ल। मुहब्बत वो नही होती ।।

वफ़ा में इश्क़ में बंदिश इनायत वो नही होती ।
मिले जो मांगकर चाहत मुहब्बत वो नही होती ।।

किसे परवाह है दिल में झरोखा हो रहा कितना ।
कहे जो आँख के आँसू हक़ीक़त वो नही होती ।।

मिले जो रहनुमां बेशक़ इरादे नेक हो उसके ।
वही मज़बूर कर दे तो हिफ़ाजत वो नही होती है ।।

जरूरी है क़ि ज़ाहिर हो तुम्हारी ह्मवफ़ाई भी ।
दिलों में जख़्म कर जाये शरारत वो नही होती ।। 

वफ़ा में बदसलूकी से नतीज़े लाख़ हो बेहतर ।
गुनाहों में जो साज़िस हो मुरौव्वत वो नही होती ।। 

कफ़न का ख़ौफ़ है जिनको जिहादी वो नही होते । 
मिली जो मौत लालच में शहादत वो नही होती ।। 

लगाकर देख ले रकमिश" तेरा दिल टूट जाएगा ।
मिला चाहत के बदले जो नसीहत वो नही होती ।।

                                राम केश मिश्र

गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

ग़ज़ल।मुहब्बत आप करते हो ।।

          ग़ज़ल।मुहब्बत आप करते हो।।

यकीं माने तो क्यों माने मुहब्बत आप करते हो ।
मुहब्बत वो नही जिसकी हिफ़ाजत आप करते हो ।।

तेरे जज़्बात तक मुझको बड़ी तकलीफ़ देते है ।
मुझे मालूम है बेशक़ शराफत आप करते हो ।। 

हुआ खुदगर्ज़ क्या मतलब ज़माने के दिलाशो से ।
मग़र जबतब ज़बाने की वक़ालत आप करते हो ।।

मुझे मंजूर का मतलब मुझको मत मिटा डालो ।
ग़मो में भी कमीनों सी शरारत आप करते हो ।।

आशिक़ हो सितमगर हो क़ातिल हो यक़ीनन तुम ।
दीवाने इस मेरे दिल पर हुक़ूमत आप करते हो ।।

अदाएं है अदाओं पर जो बंदिश हो तो कैसे हो ।
शकों पर बेवजह मुझसे नफ़ासत आप करते हो । ।

मुझे हर बार मिलती है सज़ा तेरे गुनाहों की ।
गवाही आँख भर देती ज़मानत आप करते हो ।। 

                            © राम केश मिश्र

रविवार, 30 अक्टूबर 2016

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मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016

ग़ज़ल।कोई मुफ़लिस नज़र आया।


सजी महफ़िल दिवानों से मग़र गर्दिश नजर आया । ।
कोई मुल्ज़िम नज़र आया कोई मुफ़लिस नजर आया ।।

तकल्लुफ़ इश्क़ के दरम्यां हरारत की हवा बरपी ।
ख़ुदी की चाह पर बेशक़ वहा बंदिश नजर आया ।। 

हवाला दे रहे थे सब मेरी ही बदसलूकी का ।।
मेरा वो शक़ जताना ही उन्हें साज़िस नजर आया ।।

खिले सब चाँद से चेहरे कि जुल्फें चमचमाती थी ।
दिलों में कमसिनी थी पर उन्हें नरगिश नजर आया ।।

निगाहें चुन रही तन्हा किसी चेहरे की रौनक़ को ।
यक़ीनन शौक़ ऐ जलवा जवां आतिश नजर आया ।।

साबित था जुनूने-गम मग़र ग़ुमराह था रकमिश ।
मनाही इश्क़ की करता वही मुंसिफ़ नज़र आया ।।

                          ©© राम केश मिश्र

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016

ग़ज़ल।साहिलों पर दुश्मनो को आजमाने पड़ गये।

वक़्त की बंदिश रही वादे निभाने पड़ गये ।
दोस्ती भी न मिली रिस्ते भुलाने पड़ गये ।।

थी जरा मुश्क़िल मग़र मैं फूँक कर चलता रहा । 
बेवज़ह ही हमदिलों के दिल दुखाने पड़ गये ।।

जिंदगी खुद में पहेली सी मुझे लगने लगी थी ।
आँसुओ से ज़ख्म सारे फ़िर नहाने पड़ गये ।।

एक अर्से से सिसकता जी रहा था आज तक ।
दर्द के वो गीत फिर से गुनगुनाने पड़ गये ।।

माँग सकता था नही मै खुद खुदा से मिन्नते पर ।
आपके जज़्बात में खुद को झुकाने पड़  गये ।।

तुम मिले तो क्या मिले जो ख़ुसी थी मिट गयी ।
दर्द बन सैलाब उमड़ा आँसू बहाने पड़ गये ।।

सुन जरा रकमिश तुम्हारी दोस्ती में क्या मिला ।
साहिलों पर दुश्मनों को आजमाने पड़ गये ।।  

                        ©©राम केश मिश्र 'रकमिश'

शनिवार, 10 सितंबर 2016

ग़ज़ल।मैं अकेला कर रहा हूँ ।

  मैं अकेला कर रहा हूँ झूठ का प्रयास कोई ।

मैं अकेला कर रहा हूँ झूठ का प्रयास कोई ।
लोग जो हम उम्र है रच रहे इतिहास कोई ।।

है नही मंज़िल कोई पर चल रहा हूँ रात दिन ।
दर्द बुनता जा रहा हूँ उम्रभर अनायास कोई ।।

रास्ते तक भी नही पर रास्ते है खुद बनाने ।
लापता होकर हँसी का कर रहा एहसास कोई ।

ज़िंदगी का ये सलीक़ा याद तो मुझको रहेगा ।
दूरियाँ मुझको मिली पर आ सका न पास कोई । 

याद मुझको आ रहा है दोस्ती का वो तजुर्बा ।
जिंदगी में प्यार का तो है नही अभ्यास कोई ।।

मंजिलें तुमको मिलेगी फ़िक्र में रकमिश वफ़ा की ।
ख़त्म हो जायेगी ख्वाबो की कोई तालाश कोई ।।

                         ©©राम केश मिश्र

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...