शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

।।शेर।तस्वीर तक नही आयी।

     ।शेर।तस्वीर तक नही आती।

न मुद्दत है न आशा है न शिकवा है न रंजोगम ।
मगर है याद की दुनिया बड़ा खुशहाल रहता हूँ ।।

किसी ने तो समझा मुझे नादान के काबिल ।।
साहिलों पर तो लोग मुझे पथ्थर दिल समझते है ।।

सभी को दर्द मिलता है यही दरतूर दुनिया का ।
मिले हर गम से वाक़िब हूँ नादाँ न समझना तुम ।।

मिलेगा वक्त का मरहम मिलेगे वक्त के साथी ।
यहा जो वक्त का मारा उसे उसे कुछ भी नही मिलता ।।

बेवफाओ की महफ़िल से निकलकर आ न पाये जो
उसे कैसे पता होगा  वफ़ा का भी वजूद होता है ।

ख्वाब आते है और वो ख्वाबो में ही जिये जाते है ।
हकीकत में तो  उनकी तस्वीर तक नही आती ।

                     ×××

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

।ग़ज़ल।हर मज़ा बेकार सा था।

    ।गजल।हर मज़ा बेकार सा था।

वक्त था पर दर्द में हर अश्क़ बेजार सा था ।।
साहिलों पर जो भी मिला हर शख़्स  गुनेहगार सा था

मुद्दतो बाद जब हुई शिद्दत किसी को पाने की ।।
बोली लग रही दिल की हर महफ़िल बाजार सा था ।।

न गम थे ,न ज़फ़ा थी,और न थी वहाँ तन्हाइयां भी ।।
फासले भी नही थे पर हर मजा बेकार सा था ।।

इल्म न था खुद के ऊपर जश्न तो पुरजोर था ।।
जम रही महफ़िल के ऊपर दर्द का बौछार था ।।

हर कोई था दर्द से वाक़िब मग़र ख़ामोश था ।।
प्यार से जादा उसे उस दर्द पर एतबार सा था ।।

हो रही थी गुप्तगू पर बढ़ रही थी रौनके भी ।।
इश्क़ का दरिया वही पर हर कोई बेकरार सा था ।।

थी वहा पर चाहते पर ख्वाहिशो की क़द्र न थी ।।
बच निकल आया वहा पर प्यार तो दुस्वार सा था ।।

                           R.K.MISHRA

बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

।।शेर।तस्वीर तक नही आयी।

     ।शेर।तस्वीर तक नही आती।

न मुद्दत है न आशा है न शिकवा है न रंजोगम ।
मगर है याद की दुनिया बड़ा खुशहाल रहता हूँ ।।

किसी ने तो समझा मुझे नादान के काबिल ।।
साहिलों पर तो लोग मुझे पथ्थर दिल समझते है ।।

सभी को दर्द मिलता है यही दरतूर दुनिया का ।
मिले हर गम से वाक़िब हूँ नादाँ न समझना तुम ।।

मिलेगा वक्त का मरहम मिलेगे वक्त के साथी ।
यहा जो वक्त का मारा उसे उसे कुछ भी नही मिलता ।।

बेवफाओ की महफ़िल से निकलकर आ न पाये जो
उसे कैसे पता होगा  वफ़ा का भी वजूद होता है ।

ख्वाब आते है और वो ख्वाबो में ही जिये जाते है ।
हकीकत में तो  उनकी तस्वीर तक नही आती ।

                     ×××

।।शेर।तकलीफ़।

     ।।शेर।। हकीकत।।

अब रहने भी दो इन ख्वाबो को ख्वाब ही ।
बहुत ही फर्क होता है सपनो और हकीकत में ।।

हक़ीक़त से हम बेपरवाह हो जाये तो भी कैसे ।
क्योकि स्वप्नों की तो कोई बुनियाद ही नही होती ।।

न पूंछो तो ही बेहतर उस एहसास  की दुनिया ।
वहा तस्वीर भी होती है और तकलीफ़ भी ।।

देख दुनिया के रंजोगम बड़ी तखलीफ होती है ।।
हौसले अब नही होते इरादे अब नही बनते ।

अब हमने भी तोड़ लिया ग़मो से नाता अपना ।।
आखिर दिल के हालात पर मातम मनाये कब तक ।।

हर बार मेरी चाहत में जफ़ा हो ही जाती है ।।
क्योकि खत्म हो जाती है तलाश सुरुआत से पहले ही ।।

                      ×××

शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

ग़ज़ल.प्यार का बाज़ार है .

     .ग़ज़ल.प्यार का बाज़ार है .
                             R.K.MISHRA

तुमने सजा रखा है जो ये प्यार का बाज़ार है .
ये डुबो देगा तुम्हे भी दिल तेरा गद्दार है .

तोड़ दिल को जो गये तुम वक्त से पहले मेरा .
प्यार के काबिल न छोड़ा हो गया बेकार है .

है पता तुमको नही क्या हुआ होगा यहा .
सर्द मौसम गम भरे अब अश्क़ की भरमार है .

सह अकेले मैं रहा हूँ दर्द की वो सलवटे .
ढल रही अब चांदनी चाँद भी लाचार है .

फ़िक्र मत कर बद्दुआये मैं कभी  दूँगा नही ..
पर तेरे इस संगदिल पर मेरा धिक्कार है .

रूप तेरा भी ढलेगा एक दिन तुम देख लेना .
फ़ैसला होकर रहेगा बस वक्त का आसार है..

                      ×××

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015

ग़ज़ल.मुझे अब डर नही लगता.

       ग़ज़ल .मुझे भी डर लगता
                          R.K.MISHRA

अब तेरे बिन घर मेरा ये घर नही लगता .
अब अँधेरो से मुझे भी डर नही लगता .

आयेगी तू लौट कर मुझको अभी भी है यकीं .
बेबसी तब तक रहेगी पर नही लगता  .

रूप तेरा आ ही जाता है अँधेरी रात में .
चाँद सा चेहरा वो संगमरमर नही लगता .

तू जो थी तो जिंदगी भी चल रही थी साथ में .
अब जी सकूँगा एक पल अक्सर नही लगता .

उस नदी के पास जो तू एक दिन मुझसे मिली थी .
ढूढ़ता हूँ दरबदर पर वो दर नही लगता .

इन नतीज़ो की न माने तो मेरे इस दिल की सुन ले .
ये धड़कता है अभी पथ्थर नही लगता .

एक पौधा सींचता हूँ मैं मेरे इन आंशुओं से .
लाख़ चाहू पर अभी तो फर नही लगता .

ढह ही जायेंगे घरौंदे अश्क़ की बरसात से  .
बच सकेंगे प्यार के मंज़र नही लगता .

                     ×××

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

2.दिवाने याद रहते है .

    ।।ग़ज़ल।।दीवाने याद रहते है।।

तेरी नजरो की ख़ामोशी ,  तराने याद रहते है ..
लगे जब हम कभी तुमको मनाने याद रहते है..

भले खुद को लुटा दे तू हमारी शौक में हमदम .
मग़र वो दर्द के तेरे जबाने याद रहते है ...

बहुत कम फ़ासले थे पर कभी कोशिस न की तुमने ।।
न मिलने के तुम्हारे सब बहाने याद रहते है ।। 

हमारे दिल की राहो को तुम्हारा यूँ कुचल जाना .
नही अब जख्म होते पर पुराने याद रहते हैं ..

कभी आना तो देखोगे नही बाक़ी है तन्हाई ..
मग़र तेरे गम के मंजर के तराने याद रहते है ..

करो तुम लाख कोशिस पर मुझे न भूल पावोगे .
खुदा भूले तो भूले पर दीवाने याद रहते है ..

अभी भी वक्त है "रकमिश" इरादा हो चले आना ..
तेरे आगोश के लम्हे सुहाने याद रहते है .  .

                      ×××

1.बेदम पड़ी थी रोशनी

    ।।ग़ज़ल।।बेदम पड़ी थी रौशनी।।
                             राम केश मिश्र

चाँदनी रात में सनम पड़ी थी रोशनी ।।
वक्त बेवक्त मौसम पड़ी थी रोशनी ।।

पहुचते पहुँचते तीरे नजर में खो गयी ।
था पहला अंदाज, कम पड़ी थी रोशनी ।।

चाँद तारे चल रहे थे बेवफा के साथ ।
थी चमक मद्दिम, हरदम पड़ी थी रोशनी ।।

चाँद चमका ,हुस्न चमका, जुल्फ़े चमक गयी ।
कश्मकश दिल में हुयी जम पड़ी थी रोशनी ।।

उस नज़र की इक किरन आ मेरे दिल में चुभी ।
थी ज़िगर में उलझनें तो थम पड़ी थी रोशनी ।।

थी मन्द मुस्कान पर वह जिगर में आ चुभी ।
दिल गया हालात से ,गरम पड़ी थी रोशनी ।।

इक कदम उनका बहकना इक क़दम मेरा ।
दो फ़ासले बीच तक संगम पड़ी थी रोशनी ।।

चाँद सूरज का सबेरा शमा भी सरमा गयी ।
फ़ासले जब मिट गये पुरनम पड़ी थी रोशनी ।।

वही चाँद, वही चाँदनी वही शबनम वो फ़िजा ।
थी वही मंजर वहा पर नम पड़ी थी रौशनी ।।

"रकमिश"तेरी याद में रात भर जागा किया ।
उस नज़र के बाद तो बेदम पड़ी थी रोशनी ।।

                      ×××

।।शेर।।ख़ामोशियाँ।।

            ।।शेर।।ख़ामोशियाँ।।
                            R.K.MISHRA

तेरा खामोश होना तो मुहब्बत का कोई सुबूत नही ।।
यहा गुनाह करके भी लोग बड़े खामोश रहते है ।।

हुनर वे जानते होंगे मेरा खामोशिया पढ़ने का ।।
उन्हें शक है इसी से अब चेहरा वो छिपाते है ..

जरा तुम फांदकर देखो मुहब्बत में दीवालों को ।।
ख़ामोशी के न जाने फिर कितने मोड़ आयेगे ।।

बहुत से मोड़ आते है दरिया से किनारों तक ।।
तन्हा गम ख़ामोशी तो महज है राह मंजिल के .

किसी से प्यार के दरम्यां कभी खामोश मत रहना ..
तेरा ख़ामोश रहना ही उसे सितमगर बना देगा ..

तेरी नजदीकियों से तो ग़मो के फ़ासले अच्छे .
वहा खामोश होंगे तुम मुझे परवाह न होगी .

तेरा खामोश रहना भी तेरी रौनक बढ़ा देता .
मग़र आसान इससे दिल की राह न होगी ....

किसी दिन देख लेना तुम हमारे दिल के दर्पण में .
तुम्हारा रूप ही तुमसे हाले दिल सुना देगा ..

                                  ×××

सोमवार, 12 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।।मेरा किरदार पढ़ लोगे।।

   ।।ग़ज़ल।।मेरा क़िरदार पढ़ लोगे।। 
                            R.K.MISHRA

मेरी खामोशियो में भी मेरा इज़हार पढ़ लोगे .
कभी दिल से जरा समझो मेरा किरदार पढ़ लोगे .

न साहिल है न मंजिल की मुझे परवाह रहती है .
मग़र है आँख का दरिया छलकता प्यार पढ़ लोगे .

जरा तुम रोककर कर देखो हमारे आँख के आंशू .
झलकती झील में अपना अलग संसार पढ़ लोगे..

अभी तक बात करते हो हमेसा ही इशारों से . 
जरा आग़ोश में आओ दिली झंकार पढ़ लोगे . 

महज़ ये फ़ासले ही है जो हमको दूर करते है ..
यकीनन पास आये तो मेरा इनकार पढ़ लोगे ..

अग़र है शौक तुमको तो जाते हो चले जाओ .
ज़रा फिसले मुहब्बत में ग़मो की मार पढ़ लोगे ..

नही होते है पैमाने किसी से प्यार करने के ..
खुली दिल की किताबो में लिखा एतबार पढ़ लोगे..

                        ×××

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...