गुरुवार, 9 मार्च 2017

ग़ज़ल।किस्ती का किनारा समझ बैठा मैं।

पहली नजर को सितारा समझ बैठा मै ।
तुम्हें अपनी किश्ती का किनारा समझ बैठा मै ।।1//

कल भी धोखा पाया था आपकी नज़र में ।
आज भी आपको सहारा समझ बैठा मै ।।2//

हर इम्तिहान पर लगा दी जान की बाजी ।/
तुम्हारे हर जख्म को नजारा समझ बैठा मै ।3//

हर इक नज़र के जख्म को दिखाता किसको ।
खुद को मौत का हारा समझ बैठा मै ।।4//

खुदा जाने मेरी बेपनाह मुहब्ब्त को ।
खुद को मुहब्ब्त का मारा समझ बैठा मै ।।5//

तुम्हारी आरजू को अपना तो लिया मैंने ।
जबकि खुद को बेगाना समझ बैठा मै ।।6//

सूरज सी रोशनी है तुम्हारी अदाओ मे ।
अपने ख्वाबो मे तुम्हें तारा समझ बैठा मै ।।7//

जबकि उठाई है उँगलिया तुमनें जबानें की तरफ ।।
अपनी मुहब्ब्त का इशारा समझ बैठा मै ।।8//

शिकवा नहीं हैं तुम्हारी मुहब्ब्त से "आकाश" ।।
अपने ही दिल को आवारा समझ बैठा मै ।।9//

           Ram Kesh Mishra
           Bhadaiyan,Sultanpur
    

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