शनिवार, 17 मई 2014

हमदर्द


                  हमदर्द

तुम्हें तो इल्म नही होगा तुम्हारी खुशनसीबी पर ,
कि तुम्हारा नाम भी है हमारी बेमुरौवत जिंदगी मे ।। 1।। 

वरना किसे परवाह है गैरों की इस भीड़ में ,
जबकि महफिलों में भीडो के जलसे निकलते है ।।2।।

अगर हो पास इतना तो ये फासला क्यों है ,   
न जाने कब किसी का बिछड़ने का इरादा हो ।।3।। 

तुम्हें तखलीफ होगी पर तुम्हारी कद्र करता कौन हैं ,   
किसे फुर्सत यहां पर है तेरा हमदर्द बनने का ।।4।।

सहो हर दर्द अपना तुम किसी से गम को मत बाटो  ,
तुम्हारे दर्द का हमदम तुम्हारी जिंदगी ही हैं ।।5।।

                        ***

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