बुधवार, 15 जून 2016

ग़ज़ल।मेरे एहसास की दुनिया।

       ग़ज़ल।मेरे एहसास की दुनिया।

चलो रश्मे मुहब्बत में निभाओ तो तुम्हे जाने ।
मेरे एहसास की दुनिया बसाओ तो तुम्हें जाने ।।

वही ज़ुल्फ़ों  की शाया है वही है झील सी आँखे ।
बेकाबू दिल की आहट को सुनाओ तो तुम्हे जाने ।।

पढ़ो तुम आज पैमाइस निग़ाहों की बेचैनी को ।
रहे न फ़ासला हरगिज़ मिटाओ तो तुम्हे जाने ।।

प्यास हूँ सितम ढाती तेरी ख़ामोश मदहोशी ।
लगी है आग़ जो दिल में बुझाओ तो तुम्हे जाने ।।

तड़पती रूह तन्हाई सम्हाली अब नही जाती ।
ज़रा आग़ोश में आकर समाओ तो तुम्हे जाने ।।

तेरे इन शुर्ख़ होठों पर लवों की बूंद सी आकर ।
सजी जामे मुहब्बत को पिलाओ तो तुम्हे जाने ।। 

दवा ऐ इश्क़ तो'रकमिश'ज़बाने में नही मिलती ।
वफ़ा ऐ इश्क़ में खुद को लुटाओ तो तुम्हे जाने ।।

                    राम केश मिश्र'रकमिश'

सोमवार, 13 जून 2016

ग़ज़ल।लगा है दाग़ दामन में दिखाई तो नही देता।

  गज़ल। लगा है दाग़ दामन में दिखाई तो नही देता ।।

यहा इंसान है कातिल वफ़ाई तो नही देता ।
लगा है दाग़ दामन में दिखाई तो नही देता ।।

भरोसा हो गया देख़ो उसे अब बेहयायी पर ।
किये खुद के गुनाहों की सफ़ाई तो नही देता ।

लगी पाबंदियां क्यों है ज़बाने की मुहब्बत पर ।
ग़मो में दर्द की अक़्सर दवाई तो नही देता ।। 

रूहानी प्यार की चींखे उसने भी सुनी होंगी ।
पड़ा ख़ामोस, है तन्हा ,सुनाई तो नही देता ।।

लुटेरे कर रहे होते यहा जुल्मों की पैमाइस ।
अमन की चाह में बेशक़ गवाही तो नही देता ।।

वहसी है ,दरिन्दा है ,खुदा की भी नही चिंता ।
वफ़ा ऐ जख़्म के बदले दुहाई तो नही देता ।। 

बने नासूर है 'रकमिश'ज़ख्मो का जुनूं पाकर ।
आदत हो गयी अब तो दुखाई तो नही देता ।।

                           ©राम केश मिश्र'रकमिश'

रविवार, 12 जून 2016

ग़ज़ल।दिवाने को नही मालुम।

ग़ज़ल।निगाहें ढूढ़ती बेबस दिवाने को नही मालुम ।

वफ़ा में जख़्म पाया हूँ ज़बाने को नही मालुम ।
निगाहें ढूढ़ती बेबस दिवाने को नही मालुम ।।

नही होती मुहब्बत में यहा ज़ख्मो की भरपाई ।
मिली है ज़िंदगी किस पर लुटाने को नही मालुम ।

यक़ीनन नफ़रतों में भी उसे साज़िश लगी होगी ।
ग़मो में काम आयी हो भुलाने को नही मालूम ।।

हुआ जो दर्द तो आँखे छिपाकर क्या करें आंसू ।
मिला हो एक पहलू भी छिपाने को नही मालुम । 

जवां वो ,थी हसीं वो थी ,बसी वो थी निगाहो में ।
पर आयी हो कभी तन्हा मिटाने को नही मालुम ।।

मुझे तकलीफ़ तो न थी मग़र हालात से बेबस ।
चला आया तपिस का गम बुझाने को नही मालुम ।

मुझे मालूम था 'रकमिश' मुहब्बत भी बिकाऊ है ।
मग़र दर्दो के अफ़साने भुलाने को नही मालूम ।। 

                            © राम केश मिश्र'रकमिश'

गुरुवार, 9 जून 2016

ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर।

        ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर ।

ग़ुरूर ऐ गर्व है नफ़रत ,कभी तो सर झुकाया कर ।
सभी इज्जत करे तेरी यही दौलत कमाया कर ।।

ये माना शाने शौक़त की तुम्हे परवाह है काफ़ी ।
मग़र रिस्तों की बेमानी रश्मे भी निभाया कर ।।

करेगा क्या जबाने भर की दौलत तू कमा करके ।
खुदा की बन्दगी में पल दो पल ही गवांया कर ।।

अदब से पेश तुम आओ बनो मरहम मरीजे गम ।
दिलों में प्यार की लौ से यहा रंजिश मिटाया कर ।।

मिलेगी मौत है मुमकिन गुनाहों से करो तौबा ।
खुदी की जिंदगी की भी कभी क़ीमत चुकाया कर ।।

भरे है लाख़ रंजोग़म यहा दुनियां में खुद हमदम ।
लगा कर आग़ नफ़रत की दिलों को मत जलाया कर ।।

मिलेंगी एक दिन तुमको यक़ीनन में खुसी 'रकमिश' ।
किसी की आँख में हसरत ,खुशियां तू बसाया कर ।।

                              राम केश मिश्र 'रकमिश'

ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर।

        ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर ।

ग़ुरूर ऐ गर्व है नफ़रत ,कभी तो सर झुकाया कर ।
सभी इज्जत करे तेरी यही दौलत कमाया कर ।।

ये माना शाने शौक़त की तुम्हे परवाह है काफ़ी ।
मग़र रिस्तों की बेमानी रश्मे भी निभाया कर ।।

करेगा क्या जबाने भर की दौलत तू कमा करके ।
खुदा की बन्दगी में पल दो पल ही गवांया कर ।।

अदब से पेश तुम आओ बनो मरहम मरीजे गम ।
दिलों में प्यार की लौ से यहा रंजिश मिटाया कर ।।

मिलेगी मौत है मुमकिन गुनाहों से करो तौबा ।
खुदी की जिंदगी की भी कभी क़ीमत चुकाया कर ।।

भरे है लाख़ रंजोग़म यहा दुनियां में खुद हमदम ।
लगा कर आग़ नफ़रत की दिलों को मत जलाया कर ।।

मिलेंगी एक दिन तुमको यक़ीनन में खुसी 'रकमिश' ।
किसी की आँख में हसरत ,खुशियां तू बसाया कर ।।

                              राम केश मिश्र 'रकमिश'

ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर।

        ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर ।

ग़ुरूर ऐ गर्व है नफ़रत ,कभी तो सर झुकाया कर ।
सभी इज्जत करे तेरी यही दौलत कमाया कर ।।

ये माना शाने शौक़त की तुम्हे परवाह है काफ़ी ।
मग़र रिस्तों की बेमानी रश्मे भी निभाया कर ।।

करेगा क्या जबाने भर की दौलत तू कमा करके ।
खुदा की बन्दगी में पल दो पल ही गवांया कर ।।

अदब से पेश तुम आओ बनो मरहम मरीजे गम ।
दिलों में प्यार की लौ से यहा रंजिश मिटाया कर ।।

मिलेगी मौत है मुमकिन गुनाहों से करो तौबा ।
खुदी की जिंदगी की भी कभी क़ीमत चुकाया कर ।।

भरे है लाख़ रंजोग़म यहा दुनियां में खुद हमदम ।
लगा कर आग़ नफ़रत की दिलों को मत जलाया कर ।।

मिलेंगी एक दिन तुमको यक़ीनन में खुसी 'रकमिश' ।
किसी की आँख में हसरत ,खुशियां तू बसाया कर ।।

                              राम केश मिश्र 'रकमिश'

ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर।

        ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर ।

ग़ुरूर ऐ गर्व है नफ़रत ,कभी तो सर झुकाया कर ।
सभी इज्जत करे तेरी यही दौलत कमाया कर ।।

ये माना शाने शौक़त की तुम्हे परवाह है काफ़ी ।
मग़र रिस्तों की बेमानी रश्मे भी निभाया कर ।।

करेगा क्या जबाने भर की दौलत तू कमा करके ।
खुदा की बन्दगी में पल दो पल ही गवांया कर ।।

अदब से पेश तुम आओ बनो मरहम मरीजे गम ।
दिलों में प्यार की लौ से यहा रंजिश मिटाया कर ।।

मिलेगी मौत है मुमकिन गुनाहों से करो तौबा ।
खुदी की जिंदगी की भी कभी क़ीमत चुकाया कर ।।

भरे है लाख़ रंजोग़म यहा दुनियां में खुद हमदम ।
लगा कर आग़ नफ़रत की दिलों को मत जलाया कर ।।

मिलेंगी एक दिन तुमको यक़ीनन में खुसी 'रकमिश' ।
किसी की आँख में हसरत ,खुशियां तू बसाया कर ।।

                              राम केश मिश्र 'रकमिश'

ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर।

        ग़ज़ल।यही दौलत कमाया कर ।

ग़ुरूर ऐ गर्व है नफ़रत ,कभी तो सर झुकाया कर ।
सभी इज्जत करे तेरी यही दौलत कमाया कर ।।

ये माना शाने शौक़त की तुम्हे परवाह है काफ़ी ।
मग़र रिस्तों की बेमानी रश्मे भी निभाया कर ।।

करेगा क्या जबाने भर की दौलत तू कमा करके ।
खुदा की बन्दगी में पल दो पल ही गवांया कर ।।

अदब से पेश तुम आओ बनो मरहम मरीजे गम ।
दिलों में प्यार की लौ से यहा रंजिश मिटाया कर ।।

मिलेगी मौत है मुमकिन गुनाहों से करो तौबा ।
खुदी की जिंदगी की भी कभी क़ीमत चुकाया कर ।।

भरे है लाख़ रंजोग़म यहा दुनियां में खुद हमदम ।
लगा कर आग़ नफ़रत की दिलों को मत जलाया कर ।।

मिलेंगी एक दिन तुमको यक़ीनन में खुसी 'रकमिश' ।
किसी की आँख में हसरत ,खुशियां तू बसाया कर ।।

                              राम केश मिश्र 'रकमिश'

रविवार, 5 जून 2016

ग़ज़ल।आशियाना मिल गया।

         ग़ज़ल।आशियाना मिल गया ।

आदमी को खुदा, खुद का ठिकाना मिल गया ।
फ़र्ज ,शिक़वे रह गये साहिल पुराना मिल गया । 

बेदख़ल होने लगा है अब वजूदे हुस्न से वह ।
सरज़मी के पार जाने का बहाना मिल गया ।।

आ रही थी बनके छाया रात हर दीदार करने ।
वक्त की बंदिश हटी मौका सुहाना मिल गया ।।

एकतरफ़ा प्यार से क़ायल रही जो उम्र भर ।
उम्र रूठी ,मौत को बेशक दीवाना मिल गया ।

दौलतों की शाने शौक़त हो गयी ख़ामोश देखो ।
लुट गया, खुद लूटकर सारा खज़ाना मिल गया ।।

आज तू ख़ामोश रोयेगा जबाना फ़र्क़ किसको ।
क़हक़हे दो चार दिन मातम मनाना मिल गया ।।

सो गये "रकमिश"न जाने लोग कितने शौक़ से । ।
जिंदगी को मौत का इक आशियाना मिल गया । 

                       रामकेश मिश्र"रकमिश"

गुरुवार, 2 जून 2016

ग़ज़ल।मुझको शिफ़ारिश न मिली।

        ग़ज़ल।मुझको। सिफ़ारिश न मिली ।

आज तक मेरे प्यार को बेसक गुज़ारिश न मिली ।
फ़ासला था नाम का फिर भी सिफ़ारिश न मिली । 

आये इलाजे इश्क़ की बनकर दवा इस जिंदगी में ।
चार दिन रौनक रही फ़िर कोई नुमाइश न मिली ।

एकटक नज़रों के बदले दे गये तनहाइयां फ़िर ।
दर्द का हिस्सा मिला यांदें निख़ालिश न मिली ।। 

बेवज़ह आँखों का मेरे जुल्म साबित हो चुका था ।
फ़ैसला उनको मिला मुझको सिफ़ारिश न मिली ।

एक दिल था ,एक उनके थी अदाओं की काशिस ।
एक तरफ़ा प्यार में कुछ आजमाइस न मिली । 

रौंदकर मेरी चाहतों को खो गये हमआम बनकर ।
मंजिलें लाखों मिली पर एक ख़्वाहिश न मिली ।।

आज भी गर्दिश है'रकमिश' तू नही तो कुछ नही  ।
प्यार में ढूढ़ा बहुत पर चाहत लवारिश न मिली ।।

                             ©राम केश मिश्र'रकमिश'

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...