R.K.MISHRA
कितनी भी तारीफ़ करू मैं,ज़नाब तेरे दिल का .
अब तक न मिल सका कुछ हिसाब तेरे दिल का .
तू भी तो बेचैन है मेरी काशिश के शाये में ,
और मैं भी तो हो गया हूँ बेताब तेरे दिल का .
अब ये वक्त की बंदिशें मुझे तकलीफ़ देती है .
न जाने कब से देखा है बस ख़्वाब तेरे दिल का .
तुम्हारे हुस्न की रंगत में डूबकर आया हूँ मैं,
भला कब तक महकेगा वो गुलाब तेरे दिल का .
अब बेसब्र हो गया हूँ बस तू तार तार कर दे ,
मैं बनकर दिखा दूंगा आफ़ताब तेरे दिल का .
गुनाह तू समझे तो हर सज़ा मंज़ूर मुझको हैं ,
बाक़ी होगा वो दर्द भी लाज़बाब तेरे दिल का .
ये नशा तेरी दीवानगी का सहा नही जाता है ,
अब इल्म कर ले मैं ही हूँ नबाब तेरे दिल का .
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