मंगलवार, 6 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।।मरीज़ तो था ही मैं ।।

  ।।ग़ज़ल।।मरीज़ तो था ही मैं।।

                        R.K.MISHRA
                       

राहे मुहब्बत का मरीज़ तो था ही मैं .
साथ तेरा मिला ख़ुशनसीब तो था ही मैं.

एक लम्हा प्यार का भी मुझे न दे सके ,
फर्क न पड़ता तुम्हे हबीब तो था ही मैं .

सकून मिल जाता तुम्हे भी अश्क़ की बरसात से ,
इश्क़ में गम की दवा तबीज तो था ही मैं .

हर सज़ा मंजूर थी और क्या लुटता मेरा. 
दिल भी अपना न हुआ गरीब तो था ही मैं .

बाहों में लिपटकर रो लेने दिये होते मुझे ,
फ़ासले कम ही थे और क़रीब तो था ही मैं .

पर दिखा कर इश्क़ की झूठी मुझे नुमाइसे ,
कत्ल किये जज़्बात का नाचीज़ तो था ही मैं .

हर ग़ज़ल,हर नज़्म तेरी आह का शैलाब है ।
वज़्न तेरे गम का है अजीज तो था ही मैं .

                        ...

सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।।सज़ा किसने नही पायी।।

।।ग़ज़ल।।सज़ा किसने नही पायी।।

किसी को ग़म दिया बेसक किसी की आँख भर आयी ।।
तेरे उन शुर्ख होठो की सज़ा किसने नही पायी ।।

तेरी नज़रो की छाया में सकूने इश्क़ फ़रमाते ।।
तेरी रश्मे मुहब्बत में कसम किसने नही खायी ।।

पलक झपके अदा तेरी कि पहले ही बदलती थी ।।
न समझे लोग नाज़ुक दिल मिली सबको ही तन्हाई ।।

गयी तू लूट महफ़िल को ज़रा सी रौशनी देकर ।।
बड़ी तकलीफ़ देती है तेरी बेबाक़ तन्हाई ।।

मेरा वो शक सही निकला दिलो के खेल होते है ।।
यहा सजती मुहब्बत में गमो के नाम सहनाई ।।

उन्हें आगाह कर दू मैं जिन्हें है नाज़ जिश्मो पर ।।
किये उनके गुनाहो की करूँ कब तक मैं भरपाई ।।

मग़र ये याद रख हमदम सज़ा तुमको भी है वाज़िब ।।
तेरा मज़ाक कर देगी वो तेरे दिल की मंहगाई ।।

                            R.K.MISHRA

रविवार, 4 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।।मेरी जुर्रत नही होती।।

   ।।ग़ज़ल।।मेरी जुर्रत नही होती।।

हमारे आँख के आंशुओं की कीमत नही होती ।।
अब ग़म और तन्हा से दिक्कत नही होती ।।

प्यार के सारे हुँनर मैं सीख़कर रोया किया ।।
इस इश्क़ में चाहतो की इज्जत नही होती ।।

प्यार को इक शौक़ सा सब पाल लेने है लगे ।।
अब अज़नबी दर अज़नबी हुज्जत नही होती ।।

प्यार में जब दूरियाँ बढ़ गयी तो खो गये ।।
अब इंतजरो के लिये फुर्सत नही होती ।।

सब्र करता कब तलक मैं साहिलों पर खो गया ।।
दर्द सुनते लोग सब पर मोहलत नही होती ।।

इश्क़ के इस दरमियां मैं हकीमो से मिला ।।
कह दिये तहक़ीक़ कर कि मन्नत नही होती ।।

या इलाही दर्द तेरा बन गया नासूर अब ।।
अब मेरे इन मरहमो से राहत नही होती ।।

हो सके आ देख लेना साहिलों पर दर्द मेरा ।।
अब इश्क़ करने की मेरी जुर्रत नही होती ।।  

                       R.K.MISHRA

शनिवार, 3 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।।वक्त जाया न करेंगे।।

    ।।ग़ज़ल।।वक्त जाया न करेगे।।

ख़ुशनुमा आँखों की ख़ुशबू अब चुराया न करेगे ।।
अब तेरी महफ़िल में हमदम हम भी आया न करेगें ।।

जो मेरी करते शिक़ायत जा उन्ही से पूछ ले तू ।।
जब भरोसा है नही तो वक्त जाया न करेगे ।।

वो ज़माना और था जब हम तड़पते थे कभी ।।
अब किसी की कर ख़ुशामद ख़त लिखाया न करेगें ।।

याद मुझको आ रहा है वो सितम्बर का महीना ।।
भींगती रहती थी पलकें अब भिगोया न करेगें ।।

इस नजऱ के सब इशारे सिर्फ तेरे प्यार के थे ।।
अब किसी को उम्रभर हम आजमाया न करेगें ।।

प्यार पैदा कर दिया था उस तेरे वीरान दिल में ।।
जा किसी को इश्क़ में अब राहे दिखाया न करेगें ।।

शर्म न कर आजमा ले हर किसी के प्यार को तू ।।
हम तेरे रिस्तो की चर्चा अब सुनाया न करेंगे ।।

कुछ दिनों के बाद ही तू फिर मिलेगी साहिलों पर ।।
लाख़ कोशिस तू करे नजरें मिलाया न करेंगे ।। 

              .. R.K.MISHRA

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।।एतराज क्यूँ करते हो।।

।।ग़ज़ल।।एतराज़ क्यूँ करते हो।।

दिखाकर रूप का जलवा गमे अंदाज क्यूँ करते हो ।।
सजाकर इश्क़ की महफ़िल मुझे बेताज क्यूँ करते हो ।।

निखलिश इश्क़ के जलवे उम्रभर है नही चलते ।।
जरा रौनक तो आने दो अभी से नाज़ क्यूँ करते हो ।।

यहा पर प्यार में हुस्न की चाहत नही होती किसे ।।
फिर वफ़ा के नाम पर एतराज क्यूँ करते हो ।।

तेरे आगोश के सपने मुझे हरपल सताते है ।।
मिटे जब फासले है ही तो आवाज़ क्यूँ करते हो ।।

अदायें आज तेरी जो मुझे मुफ़लिस बनाती थी ।।
उन्ही को शर्म का परदा बना अल्फ़ाज़ क्यूँ करते हो ।।

वहा देखो जहा पर तन्हा चाँद निकला है ।।
अग़र है साथ 'साहिल' पर तो अकाज क्यूँ करते हो ।।

                    ...R.K.MISHRA

बुधवार, 30 सितंबर 2015

।।ग़ज़ल।।गुनाह के ख़ातिर ।।

   ।।ग़ज़ल।।गुनाह के ख़ातिर।।


तेरी मुद्दत, तेरी इज्जत तेरी परवाह के ख़ातिर
तन्हा हूँ अकेला ,पर किसी हमराह के ख़ातिर ।। 

जा चली जा ,दूर हो जा, न लौट कर आना कभी ।।
खुदी को रोकना मुश्किल तुम्हारी आह के ख़ातिर ।।

ये इश्क़ का दरिया है काँटे यहा चुभते रहेगे ।।
तुम्हे बदनाम क्यों कर दू महज़ आगाह के ख़ातिर ।।

चलो मैं मान लेता हूँ तुम्हे मुझसे मुहब्बत है ।।
मग़र तुम कल भी आये थे किसी की चाह के ख़ातिर ।।

तोड़ आयी हो जिसका दिल उसी को तू मना ले जा ।।
नही हम तोड़ते दिल को किसी गुनाह के ख़ातिर ।।

बहुत ढूढ़ा यहा मैंने कोई बेदाग़ न निकला ।।
तभी तो आज तन्हा हूँ वफ़ा की राह के ख़ातिर ।।

                              R.K.M

मंगलवार, 29 सितंबर 2015

।।ग़ज़ल।।बता इसकी दवा क्या है।।

।।ग़ज़ल।।बता इसकी दवा क्या है ।।

मिले जो इश्क़ में ताने बता इसकी दवा क्या है ।।
लगे जब हम भुलाने तो बता इसकी दवा क्या है ।।

चलो मैं मान लेता हूँ कि तुमने भूल ही कर दी ।।
मग़र ये दिल न माने तो बता इसकी दवा क्या है ।।

तेरे नज़दीक आने को तरसती रह गयी आँखे ।।
लगे आंशू बहाने तो बता इसकी दवा क्या है ।। 

तुम्हारी जिन अदाओ को बनाया इश्क़ का दर्पण ।।
लगे वह दिल जलाने तो बता इसकी दवा क्या है ।। 

यहा कीमत नही होती भरोसा टूट जाने पर ।।
करे कोई बहाने तो बता इसकी दवा क्या है ।। 

                           R.K.M

सोमवार, 28 सितंबर 2015

।।ग़ज़ल।।तुम्हारी याद के सदमे।।

   ।।ग़ज़ल।।तुमारी याद के सदमे।।

पुराने जख़्म थे फिर भी सहे नाशाद के सदमे ।।
अभी तकलीफ़ देते है कई दिन बाद के सदमे ।।

ये आंशू है बहेंगे ही करू मैं लाख कोसिस पर ।।
गिरेंगे भूल जाउगा तुम्हारी याद के सदमे।। 

तुम्हे क्या तुम तो बच निकले किसी महफूज़ 'साहिल' पर ।।
मुझे झकझोर जाते है हुये बर्बाद के सदमे ।।

हरारत थी तुम्हे भी पर निकल दरिया से तुम भागे ।।
अकेले ही सहे थे हम तेरी फरियाद के सदमे ।।

उम्रभर आह भर भरके घरौंदा जो बनया था ।।
मिटा थी इश्क की मंजिल ढही बुनियाद के सदमे ।।

न पूंछो है बहुत अच्छा हमारे अश्क़ की कीमत ।।
सहता जा रहा इनकी बड़ी तादाद के सदमे ।। 

                             R.K.M

रविवार, 27 सितंबर 2015

।।ग़ज़ल।।मुझे प्यार का तजुर्बा था।।

।।ग़ज़ल।।मुझे प्यार का तजुर्बा था ।।

राह ऐ मुहब्बत से गया हार का तजुर्बा था ।।
तुझे तेरी अदा मुझे प्यार का तजुर्बा था ।।

लाख़ नाकामियो के बाद भी हौसले मिलते रहे ।।
रह गया तन्हा कि इंतजार का तजुर्बा था ।।

तू मिलती तो थी किसीे और के ख़ातिर ही सही ।।
मुझे मेरी आँखों को दीदार का तजुर्बा था ।।

अब तक तेरे आने की तारीख़ ने दस्तख़त न दी ।।
झूठा था तेरा वादा पर एतबार का तर्जुबा था ।।

रूबरू हुये भी तो आग लगा बैठे दिल में ।।
वर्षो बाद कर ही दिये इनकार का तजुर्बा था ।।

ऐ "साहिलो" पर छोड़ कर चले जाने वाले दोस्त ।।
मैं रह ही गया ख़िदमत में बेकार का तजुर्बा था ।।

   
                       .. R.K.M

शनिवार, 26 सितंबर 2015

।।ग़ज़ल।।इंसान नही मिलते है ।।

  ।।ग़ज़ल।।इंसान नही मिलते है।।


ये इश्क़ है दोस्त यहा पर ईमान नही मिलते है।।
इस इश्क की दुनिया में इंसान नही मिलते है।।

तोड़ देगे दिल हरहाल किसी 'साहिल' पर ।।
यहा दर्द के शिवा कुछ इनाम नही मिलते है ।। 

नाम तक मिट जाता वफ़ा की कोई बात नही ।।
राहे मुहब्बत पर कुछ निसान नही मिलते है ।।

अदाओ की कशिश की कोई परवाह नही होगी तब ।।
'साहिल' पर फ़िसले तो गुमान नही मिलते है ।।

हर शख़्स गम का मारा हर ओर गुमसुदा सब ।।
हर ओर बेखुदी है यहा हैरान नही मिलते है ।। 

इस इश्क़ की महफ़िल में हर तऱफ रंजोगम हैं ।।
यहा कारवाँ निकलता अंजान नही मिलते है ।।

                             ..R.K.M

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...