मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

ग़ज़ल.प्यार का मतलब तो है.

    ग़ज़ल .प्यार का मतलब तो है .

ये जिंदगी तेरे इस निखार का मतलब तो है ।।
देर से ही सही पर इस प्यार का मतलब तो है ।। 

बहारें लाख़ आयीं हो चमन भी मुस्कुराया हो ,
मग़र तपती दुपहरी में बौछार का मतलब तो है ।।

ग़मो की फ़िक्र क्या करना ग़मो की जिंदगी सारी ।
किसी की याद में तन्हा इंतजार का मतलब तो है ।। 

जरूरी है नही होना सभी का बेवफा हमदम ।
भरें हों आँख में आँशू तो इंकार का मतलब तो है ।।

लगाकर जान की बाज़ी तुम्हारे दिल को जीते जो ।
तुम्हारी शौक़ के आगे गया हो हार का मतलब तो है ।।

करे हम रोज़ कोशिस पर मिले जब न खुदा हमको ।
करो उम्मीद मत छोड़ो एतबार का मतलब तो है ।।

बेशक़ अदाओं की नुमाइस दिल बहला रही हो पर ।
किसी के रूप की चितवन दीदार का मतलब तो है ।। 

कभी तुम करके देखो ख़ुद खुले दिल से इबादत को ।
मिलेगी रब की जन्नत भी संसार का मतलब तो है ।।
                  

                         ----R.K.MISHRA

सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

।ग़ज़ल।मेरी करते शिकायत है।

।ग़ज़ल।मेरी करते शिकायत हैं।

मेरे हमदर्द वो है जो मेरी करते शिकायत है ।।
दिलोँ से याद करते है जुबां करती बगावत है ।।

बढ़ी है रंजिसे तो क्या फ़िकर करता हूँ उनकी मैं ।
उनके हमवफओ की मेरे इस दिल में इज्जत है ।।

ज़रा मग़रूर रहते है मग़र धोख़ा नही देते ।।
छुपे रुस्तम नही होते अभी उनमे ग़नीमत है ।।

बढ़ें है फासले तो क्या कभी हम एक तो थे ही ।
किसी भी दोस्त से बढ़कर अभी उनकी भी कीमत है ।।

कभी हमको मिली खुशियां उन्हें न गम हुआ होगा ।
उन्होंने ख्वाब में देखा मिली उनको भी जन्नत है ।। 

आदत है नही उनकी करे तारीफ़ झूठी वे ।
मग़र तारीफ़ से बढ़कर लगी उनकी नफ़ासत है ।। 

यकीनन दोस्त न ठहरे मग़र हैं दोस्त के क़ाबिल ।
उन्हीँ की बद्दुआओं में छिपी मेरी मुहबत है ।।
                   
                        -- R.K.MISHRA

।ग़ज़ल।मेरी करते शिकायत है।

।ग़ज़ल।मेरी करते शिकायत हैं।

मेरे हमदर्द वो है जो मेरी करते शिकायत है ।।
दिलोँ से याद करते है जुबां करती बगावत है ।।

बढ़ी है रंजिसे तो क्या फ़िकर करता हूँ उनकी मैं ।
उनके हमवफओ की मेरे इस दिल में इज्जत है ।।

ज़रा मग़रूर रहते है मग़र धोख़ा नही देते ।।
छुपे रुस्तम नही होते अभी उनमे ग़नीमत है ।।

बढ़ें है फासले तो क्या कभी हम एक तो थे ही ।
किसी भी दोस्त से बढ़कर अभी उनकी भी कीमत है ।।

कभी हमको मिली खुशियां उन्हें न गम हुआ होगा ।
उन्होंने ख्वाब में देखा मिली उनको भी जन्नत है ।। 

आदत है नही उनकी करे तारीफ़ झूठी वे ।
मग़र तारीफ़ से बढ़कर लगी उनकी नफ़ासत है ।। 

यकीनन दोस्त न ठहरे मग़र हैं दोस्त के क़ाबिल ।
उन्हीँ की बद्दुआओं में छिपी मेरी मुहबत है ।।
                   
                        -- R.K.MISHRA

शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।न तुझमे कमी है।

        ।गज़ल।न तुझमे कमी है ।।
    

वहाँ तेरे आँगन में महफ़िल जमी है ।
यहाँ मेरे दिल पर गमे रौशनी है ।।

भले आज तेरी नजर न उठे ये ।
जो चेहरे से हटकर जमी पे ज़मी है ।।

मग़र आज मुझको पता चल गया है ।।
यक़ीनन छटेगा ये गम मौसमी है ।।

बहेगी हवा कोई चाहत की गर तो ।
ढहेगा तेरा गम ये जो रेशमी है ।।

अग़र हौसला हो जरा आज कह दे ।।
न तुझमे कमी है न मुझमे कमी है ।।

जरा पास आकरके आँखों में झांको ।।
पलको पे उभरी नमी ही नमी है ।।

अग़र पास में हो छिपा लेना वो खत ।। दिखाना न उसका यहा लाज़मी है ।।

असर हो रहा है ये गम के है लम्हे ।
ग़र तस्वीर तेरी दिल में थमी है ।।

चलो अब तो लब्जे जुबाँ से तो बोलो ।
न मैं मोम हूँ न तू कोई ममी है ।।

                     ......R.K.MISHRA
                       ***

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

।।शेर।तस्वीर तक नही आयी।

     ।शेर।तस्वीर तक नही आती।

न मुद्दत है न आशा है न शिकवा है न रंजोगम ।
मगर है याद की दुनिया बड़ा खुशहाल रहता हूँ ।।

किसी ने तो समझा मुझे नादान के काबिल ।।
साहिलों पर तो लोग मुझे पथ्थर दिल समझते है ।।

सभी को दर्द मिलता है यही दरतूर दुनिया का ।
मिले हर गम से वाक़िब हूँ नादाँ न समझना तुम ।।

मिलेगा वक्त का मरहम मिलेगे वक्त के साथी ।
यहा जो वक्त का मारा उसे उसे कुछ भी नही मिलता ।।

बेवफाओ की महफ़िल से निकलकर आ न पाये जो
उसे कैसे पता होगा  वफ़ा का भी वजूद होता है ।

ख्वाब आते है और वो ख्वाबो में ही जिये जाते है ।
हकीकत में तो  उनकी तस्वीर तक नही आती ।

                     ×××

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

।ग़ज़ल।हर मज़ा बेकार सा था।

    ।गजल।हर मज़ा बेकार सा था।

वक्त था पर दर्द में हर अश्क़ बेजार सा था ।।
साहिलों पर जो भी मिला हर शख़्स  गुनेहगार सा था

मुद्दतो बाद जब हुई शिद्दत किसी को पाने की ।।
बोली लग रही दिल की हर महफ़िल बाजार सा था ।।

न गम थे ,न ज़फ़ा थी,और न थी वहाँ तन्हाइयां भी ।।
फासले भी नही थे पर हर मजा बेकार सा था ।।

इल्म न था खुद के ऊपर जश्न तो पुरजोर था ।।
जम रही महफ़िल के ऊपर दर्द का बौछार था ।।

हर कोई था दर्द से वाक़िब मग़र ख़ामोश था ।।
प्यार से जादा उसे उस दर्द पर एतबार सा था ।।

हो रही थी गुप्तगू पर बढ़ रही थी रौनके भी ।।
इश्क़ का दरिया वही पर हर कोई बेकरार सा था ।।

थी वहा पर चाहते पर ख्वाहिशो की क़द्र न थी ।।
बच निकल आया वहा पर प्यार तो दुस्वार सा था ।।

                           R.K.MISHRA

बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

।।शेर।तस्वीर तक नही आयी।

     ।शेर।तस्वीर तक नही आती।

न मुद्दत है न आशा है न शिकवा है न रंजोगम ।
मगर है याद की दुनिया बड़ा खुशहाल रहता हूँ ।।

किसी ने तो समझा मुझे नादान के काबिल ।।
साहिलों पर तो लोग मुझे पथ्थर दिल समझते है ।।

सभी को दर्द मिलता है यही दरतूर दुनिया का ।
मिले हर गम से वाक़िब हूँ नादाँ न समझना तुम ।।

मिलेगा वक्त का मरहम मिलेगे वक्त के साथी ।
यहा जो वक्त का मारा उसे उसे कुछ भी नही मिलता ।।

बेवफाओ की महफ़िल से निकलकर आ न पाये जो
उसे कैसे पता होगा  वफ़ा का भी वजूद होता है ।

ख्वाब आते है और वो ख्वाबो में ही जिये जाते है ।
हकीकत में तो  उनकी तस्वीर तक नही आती ।

                     ×××

।।शेर।तकलीफ़।

     ।।शेर।। हकीकत।।

अब रहने भी दो इन ख्वाबो को ख्वाब ही ।
बहुत ही फर्क होता है सपनो और हकीकत में ।।

हक़ीक़त से हम बेपरवाह हो जाये तो भी कैसे ।
क्योकि स्वप्नों की तो कोई बुनियाद ही नही होती ।।

न पूंछो तो ही बेहतर उस एहसास  की दुनिया ।
वहा तस्वीर भी होती है और तकलीफ़ भी ।।

देख दुनिया के रंजोगम बड़ी तखलीफ होती है ।।
हौसले अब नही होते इरादे अब नही बनते ।

अब हमने भी तोड़ लिया ग़मो से नाता अपना ।।
आखिर दिल के हालात पर मातम मनाये कब तक ।।

हर बार मेरी चाहत में जफ़ा हो ही जाती है ।।
क्योकि खत्म हो जाती है तलाश सुरुआत से पहले ही ।।

                      ×××

शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

ग़ज़ल.प्यार का बाज़ार है .

     .ग़ज़ल.प्यार का बाज़ार है .
                             R.K.MISHRA

तुमने सजा रखा है जो ये प्यार का बाज़ार है .
ये डुबो देगा तुम्हे भी दिल तेरा गद्दार है .

तोड़ दिल को जो गये तुम वक्त से पहले मेरा .
प्यार के काबिल न छोड़ा हो गया बेकार है .

है पता तुमको नही क्या हुआ होगा यहा .
सर्द मौसम गम भरे अब अश्क़ की भरमार है .

सह अकेले मैं रहा हूँ दर्द की वो सलवटे .
ढल रही अब चांदनी चाँद भी लाचार है .

फ़िक्र मत कर बद्दुआये मैं कभी  दूँगा नही ..
पर तेरे इस संगदिल पर मेरा धिक्कार है .

रूप तेरा भी ढलेगा एक दिन तुम देख लेना .
फ़ैसला होकर रहेगा बस वक्त का आसार है..

                      ×××

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015

ग़ज़ल.मुझे अब डर नही लगता.

       ग़ज़ल .मुझे भी डर लगता
                          R.K.MISHRA

अब तेरे बिन घर मेरा ये घर नही लगता .
अब अँधेरो से मुझे भी डर नही लगता .

आयेगी तू लौट कर मुझको अभी भी है यकीं .
बेबसी तब तक रहेगी पर नही लगता  .

रूप तेरा आ ही जाता है अँधेरी रात में .
चाँद सा चेहरा वो संगमरमर नही लगता .

तू जो थी तो जिंदगी भी चल रही थी साथ में .
अब जी सकूँगा एक पल अक्सर नही लगता .

उस नदी के पास जो तू एक दिन मुझसे मिली थी .
ढूढ़ता हूँ दरबदर पर वो दर नही लगता .

इन नतीज़ो की न माने तो मेरे इस दिल की सुन ले .
ये धड़कता है अभी पथ्थर नही लगता .

एक पौधा सींचता हूँ मैं मेरे इन आंशुओं से .
लाख़ चाहू पर अभी तो फर नही लगता .

ढह ही जायेंगे घरौंदे अश्क़ की बरसात से  .
बच सकेंगे प्यार के मंज़र नही लगता .

                     ×××

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...