।।ग़ज़ल।।मुझे प्यार का तजुर्बा था ।।
राह ऐ मुहब्बत से गया हार का तजुर्बा था ।।
तुझे तेरी अदा मुझे प्यार का तजुर्बा था ।।
लाख़ नाकामियो के बाद भी हौसले मिलते रहे ।।
रह गया तन्हा कि इंतजार का तजुर्बा था ।।
तू मिलती तो थी किसीे और के ख़ातिर ही सही ।।
मुझे मेरी आँखों को दीदार का तजुर्बा था ।।
अब तक तेरे आने की तारीख़ ने दस्तख़त न दी ।।
झूठा था तेरा वादा पर एतबार का तर्जुबा था ।।
रूबरू हुये भी तो आग लगा बैठे दिल में ।।
वर्षो बाद कर ही दिये इनकार का तजुर्बा था ।।
ऐ "साहिलो" पर छोड़ कर चले जाने वाले दोस्त ।।
मैं रह ही गया ख़िदमत में बेकार का तजुर्बा था ।।
.. R.K.M